पुणे : विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने भारतीय संस्कृति और आधुनिक कूटनीति के बीच गहरा संबंध रेखांकित करते हुए भगवान श्रीकृष्ण और हनुमान को दुनिया के सबसे महान राजनयिक बताया है। शनिवार को महाराष्ट्र के पुणे में एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन कथाओं में केवल शक्ति और युद्ध ही नहीं, बल्कि सूक्ष्म रणनीति, संवाद और दूरदर्शी कूटनीति के उत्कृष्ट उदाहरण भी निहित हैं।
डॉ. जयशंकर ने कहा कि महाभारत और रामायण को अक्सर संघर्ष और पारिवारिक मूल्यों के संदर्भ में देखा जाता है, लेकिन इनमें निहित कूटनीतिक कौशल पर पर्याप्त चर्चा नहीं होती। उन्होंने बताया कि जब उनसे पूछा गया कि उनके अनुसार इतिहास के सबसे महान राजनयिक कौन हैं, तो उनका उत्तर था—भगवान कृष्ण और हनुमान। कृष्ण महाभारत के महान राजनयिक थे, जबकि हनुमान रामायण के अद्वितीय दूत और रणनीतिकार।
उन्होंने हनुमान के लंका गमन का उदाहरण देते हुए कहा कि उनका मिशन केवल संदेश पहुंचाना नहीं, बल्कि सूचनाएं जुटाना भी था। हनुमान ने मां सीता तक पहुंचकर उनका मनोबल बढ़ाया, लंका की परिस्थितियों को समझा और विभीषण के चरित्र को पहचानते हुए यह आकलन किया कि वह एक सद्गुणी व्यक्ति हैं, जो गलत संगति में हैं और सही दिशा मिलने पर राम के पक्ष में आ सकते हैं। जयशंकर ने कहा कि यदि ऐसे चरित्रों को आज की दुनिया के सामने प्रस्तुत नहीं किया जाता, तो यह हमारी संस्कृति के साथ बड़ा अन्याय होगा।
दुनिया की नजर में भारत की बदली छवि
विदेश मंत्री ने कहा कि आज वैश्विक मंच पर भारत को पहले की तुलना में कहीं अधिक सकारात्मक और गंभीर दृष्टि से देखा जा रहा है। पुणे में सिम्बायोसिस इंटरनेशनल विश्वविद्यालय के 22वें दीक्षांत समारोह में उन्होंने कहा कि वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में बड़े बदलाव आए हैं और अब शक्ति व प्रभाव के कई केंद्र उभर चुके हैं। ऐसी स्थिति में कोई भी देश, चाहे वह कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, हर मुद्दे पर अपनी इच्छा नहीं थोप सकता।
डॉ. जयशंकर ने कहा कि भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि में आया यह परिवर्तन निर्विवाद है। राष्ट्रीय ब्रांड और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा—दोनों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। आज दुनिया भारतीयों को मजबूत कार्य-नैतिकता वाले, तकनीकी रूप से दक्ष और परिवार-केंद्रित संस्कृति से जुड़े लोगों के रूप में देखती है। उन्होंने बताया कि विदेश यात्राओं के दौरान उन्हें प्रवासी भारतीयों के योगदान और क्षमता की सराहना सुनने को मिलती है।
उन्होंने कहा कि भारत में कारोबार करना अब पहले से आसान हो रहा है और जीवन-यापन की सहूलियतें भी बढ़ रही हैं। इसके साथ ही, भारत को लेकर बनी पुरानी रूढ़िवादी धारणाएं धीरे-धीरे पीछे छूट रही हैं। विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि भले ही विकास और आधुनिकीकरण की राह में अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है, लेकिन भारत की छवि में आया यह सकारात्मक बदलाव एक ठोस वास्तविकता है, जिसकी पुष्टि आंकड़े भी करते हैं।
अर्थव्यवस्था, रोजगार और मानव संसाधन पर जोर
डॉ. जयशंकर ने कहा कि आज भारत को उसकी प्रतिभा और कौशल से परिभाषित किया जा रहा है और यही हमारे राष्ट्रीय ब्रांड को आकार दे रहा है। उन्होंने बताया कि भारत अब दुनिया से पहले की तुलना में कहीं अधिक आत्मविश्वास और क्षमता के साथ संवाद कर रहा है। हालांकि, उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि अधिकांश देशों ने व्यापार, निवेश और सेवाओं के माध्यम से वैश्विक पहचान बनाई है और भारत का मार्ग भी यही रहा है।
उन्होंने कहा कि निरंतर आर्थिक वृद्धि के बावजूद भारत को जो विशेष बनाता है, वह मानव संसाधनों की बढ़ती प्रासंगिकता है। यदि देश को एक बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में प्रौद्योगिकी के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना है और औद्योगिक कार्य-संस्कृति को विकसित करना है, तो आधुनिक और पर्याप्त विनिर्माण क्षमता का निर्माण अनिवार्य है। इससे सेवा क्षेत्र में भी भारत की क्षमताएं और सशक्त होंगी।
विदेश मंत्री ने कहा कि बढ़ती आय और मांग के साथ सामाजिक-आर्थिक जरूरतों का दायरा भी व्यापक होता जा रहा है। ऐसे में देश को केवल इंजीनियरों, डॉक्टरों, प्रबंधकों, वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों की ही नहीं, बल्कि शिक्षकों, शोधकर्ताओं, इतिहासकारों, कलाकारों और खिलाड़ियों की भी समान रूप से आवश्यकता होगी।
उन्होंने बताया कि पिछले एक दशक में देश के उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या लगभग दोगुनी हो चुकी है, हालांकि आगे और विस्तार तथा सुधार की गुंजाइश बनी हुई है। डॉ. जयशंकर ने कहा कि वैश्वीकरण ने सोचने और काम करने के हमारे तरीके को मूल रूप से बदल दिया है। औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के बाद जिन देशों ने अपने भविष्य का नियंत्रण अपने हाथ में लिया और बेहतर नीतिगत विकल्प चुने, वे तेजी से आगे बढ़े और समृद्ध हुए।
उन्होंने कहा कि भारत के विकास की यात्रा में नेतृत्व और शासन व्यवस्था की भूमिका निर्णायक रही है। जहां इस दौर में चीन को सबसे अधिक लाभ मिला, वहीं भारत ने भी उल्लेखनीय प्रगति की है। इसके विपरीत, पश्चिमी दुनिया का एक बड़ा हिस्सा आज ठहराव की भावना से गुजर रहा है, जो धीरे-धीरे राजनीतिक रूप लेती जा रही है।













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