डेस्क : पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गहन पुनरीक्षण अभियान (SIR) को लेकर चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। कोलकाता में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने दावा किया कि एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान उन विवाहित महिलाओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं, जिन्होंने शादी के बाद अपना उपनाम बदला। ममता बनर्जी ने कहा कि यह सीधे तौर पर महिलाओं के मतदान अधिकारों का हनन है।
मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि एसआईआर के नियम बार-बार बदले जा रहे हैं और चुनाव आयोग “व्हाट्सऐप के जरिए” काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि कभी एक नियम लागू होता है, तो कभी दूसरा, जिससे आम मतदाता भ्रम और असमंजस की स्थिति में हैं।
‘भाजपा के एआई टूल का इस्तेमाल’ का आरोप
ममता बनर्जी ने दावा किया कि निर्वाचन आयोग ने भाजपा के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) उपकरणों का इस्तेमाल किया, जिसके कारण एसआईआर डेटा में नामों का मिलान सही तरीके से नहीं हो पाया। इसका सबसे ज्यादा असर उन महिलाओं पर पड़ा, जिन्होंने विवाह के बाद अपना उपनाम बदला था और जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। उन्होंने सवाल उठाया कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त को यह अधिकार कैसे है कि वह यह तय करें कि मतदाता सूची का आधा हिस्सा हटाया जाए और किसकी सरकार बने।
‘निर्वाचन आयोग भाजपा की कठपुतली’
चुनाव आयोग पर तीखा हमला बोलते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि आयोग भाजपा की कठपुतली की तरह काम कर रहा है और बिना ठोस कारण बताए मनमाने ढंग से मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि एसआईआर के नियमों में जहां सूक्ष्म पर्यवेक्षकों के इस्तेमाल पर रोक है, वहीं केवल पश्चिम बंगाल में ही इन्हें तैनात किया गया है। इसके अलावा उन्होंने सवाल उठाया कि अगर बिहार में अधिवास प्रमाण पत्र को मान्यता दी गई है, तो बंगाल में ऐसा क्यों नहीं किया जा रहा।
मुख्य चुनाव आयुक्त को पांचवां पत्र
इससे एक दिन पहले ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को अपना पांचवां पत्र लिखा था। पत्र में उन्होंने आरोप लगाया कि एसआईआर प्रक्रिया के कारण नागरिकों को अनावश्यक रूप से परेशान किया जा रहा है और बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं, जिससे वे मतदान के अधिकार से वंचित हो रहे हैं।
मुख्यमंत्री ने एसआईआर के तहत होने वाली सुनवाइयों के दौरान दस्तावेजों की पावती न दिए जाने को सबसे गंभीर खामी बताया। उन्होंने कहा कि मतदाता अपनी पात्रता के समर्थन में जरूरी दस्तावेज जमा कर रहे हैं, लेकिन कई मामलों में उनकी कोई रसीद या पावती नहीं दी जाती। बाद में सत्यापन के दौरान इन्हीं दस्तावेजों को “नहीं मिले” या “रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं” बताकर मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए जाते हैं।













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