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Home आराधना-साधना

मार्च में कब है सोम प्रदोष व्रत? जानिए महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

ON THE DOT TEAM by ON THE DOT TEAM
March 14, 2026
in आराधना-साधना
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प्रदोष का व्रत

हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का विशेष आध्यात्मिक महत्व माना गया है। भगवान शिव की आराधना के लिए सोमवार और प्रदोष व्रत का संयोग अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। इस दिन भक्त पूरे श्रद्धा और विधि-विधान के साथ भगवान शिव की पूजा-अर्चना करते हैं। मान्यता है कि प्रदोष व्रत रखने से जीवन में सुख, समृद्धि और शांति का आगमन होता है तथा साधक की मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक महीने के शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है। सप्ताह के जिस दिन यह तिथि पड़ती है, उसी के अनुसार उसका नाम भी निर्धारित होता है, जैसे सोमवार को पड़ने पर उसे सोम प्रदोष, मंगलवार को भौम प्रदोष आदि कहा जाता है। प्रत्येक प्रदोष व्रत की अपनी विशेष महिमा और महत्व होता है।

प्रदोष व्रत का आध्यात्मिक महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार त्रयोदशी तिथि के सूर्यास्त और रात्रि के मध्य का जो संधिकाल होता है, उसे प्रदोष काल कहा जाता है। इसी समय भगवान शिव की विशेष पूजा की जाती है। कहा जाता है कि इस व्रत का पालन सबसे पहले चंद्रदेव ने किया था, जिससे उन्हें अपने दोषों से मुक्ति प्राप्त हुई।

शास्त्रों के अनुसार प्रदोष काल में भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। यह व्रत आध्यात्मिक उन्नति और मनोकामना पूर्ति का माध्यम भी माना जाता है।

मार्च में पहला प्रदोष व्रत कब है?

पंचांग के अनुसार मार्च माह का पहला प्रदोष व्रत 16 मार्च 2026 को रखा जाएगा। यह दिन सोमवार होने के कारण इसे सोम प्रदोष व्रत कहा जाएगा। सोमवार भगवान शिव को समर्पित होता है, इसलिए इस दिन प्रदोष व्रत का महत्व और भी बढ़ जाता है।

धार्मिक मान्यता है कि सोम प्रदोष व्रत करने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इस व्रत से दांपत्य जीवन में प्रेम और सौहार्द बढ़ता है तथा जीवन में आने वाली बाधाएँ दूर होती हैं।

प्रदोष व्रत का शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि का आरंभ
16 मार्च 2026 को सुबह 9:40 बजे से होगा।

इस तिथि का समापन
17 मार्च 2026 को सुबह 9:23 बजे पर होगा।

प्रदोष व्रत की मुख्य पूजा सूर्यास्त के समय प्रदोष काल में की जाती है, इसलिए इस दिन शाम के समय शिव पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

प्रदोष व्रत की पूजा विधि

प्रदोष व्रत के दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ, हल्के रंग के वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान शिव का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।

इसके पश्चात शिवलिंग पर जल अर्पित करते हुए जलाभिषेक करें और दिनभर फलाहार करते हुए व्रत रखें। चूंकि इस व्रत की मुख्य पूजा प्रदोष काल में की जाती है, इसलिए शाम को प्रदोष काल से पहले पुनः स्नान करना शुभ माना जाता है।

इसके बाद शिवलिंग पर जल, बेलपत्र, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करते हुए विधि-विधान से पूजा करें। पूजा के समय प्रदोष व्रत की कथा सुनना और अंत में भगवान शिव की आरती करना आवश्यक माना गया है। आरती के पश्चात प्रसाद ग्रहण कर व्रत का समापन किया जाता है। श्रद्धालु चाहें तो दिन में एक समय सात्विक भोजन भी कर सकते हैं।

प्रदोष व्रत के विशेष उपाय

पापों से मुक्ति के लिए
प्रदोष व्रत के दिन शिवलिंग पर तिल अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि तिल से अभिषेक करने से व्यक्ति के पापों का क्षय होता है और जीवन में सकारात्मकता का संचार होता है।

आर्थिक समृद्धि के लिए
यदि आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा हो तो प्रदोष व्रत के दिन शिवलिंग पर कच्चे चावल अर्पित करें। ऐसा करने से धन लाभ के योग बनते हैं और आर्थिक स्थिति में सुधार आता है।

दांपत्य जीवन में सुख के लिए
दांपत्य जीवन में प्रेम और मधुरता बढ़ाने के लिए भगवान शिव को दही में शहद मिलाकर भोग लगाना शुभ माना गया है।

विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए
यदि विवाह में किसी प्रकार की अड़चन आ रही हो तो प्रदोष व्रत के दिन स्नान के बाद भगवान शिव के समक्ष बैठकर श्रद्धापूर्वक
“ॐ नमः शिवाय” मंत्र का 11 बार जप करें और अंत में पुष्प अर्पित करें। ऐसा करने से विवाह संबंधी बाधाएँ दूर होने की मान्यता है।

आस्था और श्रद्धा के साथ किया गया प्रदोष व्रत न केवल आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है, बल्कि जीवन में सुख, समृद्धि और संतुलन का मार्ग भी प्रशस्त करता है। भगवान शिव की कृपा से भक्तों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आने की मान्यता प्राचीन काल से चली आ रही है।

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