जयपुर : निर्माण नगर स्थित महाप्रज्ञ इंटरनेशनल स्कूल में सोमवार को आयोजित आध्यात्मिक प्रवचन में मुनि श्री तत्त्व रूचि जी “तरुण” ने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के जीवन और ‘राम नाम’ की महिमा पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि “जो आत्मानन्द में रमण कराता है, वही राम है।” उनके अनुसार जब व्यक्ति के भीतर हर रोम से राम नाम की ध्वनि गूंजने लगे, तब समझना चाहिए कि वह आत्म-रमण की अवस्था को प्राप्त हो चुका है।
मुनि श्री ने बताया कि मानव शरीर में करोड़ों रोमकूप होते हैं, और यदि प्रत्येक रोम से ‘राम’ का स्वर अनुगुंजित होने लगे, तो यह आत्मानुभूति और परम शांति का संकेत है। उन्होंने कहा कि साधना का सर्वोच्च लक्ष्य परमात्मा से एकाकार होना है, और यह स्थिति केवल निरंतर आत्मचिंतन और भक्ति से ही संभव है।
अपने प्रवचन में उन्होंने यह भी कहा कि वही व्यक्ति जनमानस में पूजनीय और लोकप्रिय बनता है, जिसका चरित्र हर परिस्थिति में अनुकरणीय हो। उन्होंने भगवान राम के जीवन को आदर्श बताते हुए कहा कि उनका आचरण मानवता के लिए मार्गदर्शक है। “राम नाम केवल एक शब्द नहीं, बल्कि वह शक्ति है जो व्यक्ति के भीतर आत्म-रमणता का भाव जागृत करती है,” उन्होंने जोड़ा।
इस अवसर पर मुनि श्री संभव कुमार जी ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि “सभी कलाओं में श्रेष्ठ है—जीने की कला, और यह कला धर्म से प्राप्त होती है।” उन्होंने कहा कि संसार में अनेक प्रकार की कलाएं सिखाई जाती हैं, लेकिन जीवन को सही ढंग से जीने की कला का प्रशिक्षण दुर्लभ है। जब मनुष्य आत्माराम का ध्यान करता है, तभी उसे वास्तविक परमानन्द की अनुभूति होती है।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे, जिन्होंने प्रवचनों को श्रवण कर आध्यात्मिक मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।













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