नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि भारत में वोट डालने का अधिकार और चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं हैं, बल्कि ये केवल वैधानिक (Statutory) अधिकार हैं, जिन्हें कानून के तहत नियंत्रित किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी राजस्थान की जिला दूध उत्पादक सहकारी समितियों से जुड़े एक चुनावी विवाद की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने राजस्थान हाई कोर्ट के उस फैसले को भी खारिज कर दिया, जिसमें चुनाव लड़ने की पात्रता से जुड़े नियमों को रद्द कर दिया गया था।
“मौलिक अधिकार नहीं, वैधानिक अधिकार”
न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि संविधान के तहत न तो मतदान का अधिकार और न ही चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार है। ये दोनों अधिकार केवल कानून द्वारा दिए जाते हैं और उन्हीं सीमाओं के भीतर लागू होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन अधिकारों का स्वरूप पूरी तरह वैधानिक है और ये केवल तभी तक मौजूद रहते हैं जब तक कानून उन्हें मान्यता देता है।
मतदान और चुनाव लड़ने में अंतर
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मतदान का अधिकार और चुनाव लड़ने का अधिकार दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं।
मतदान का अधिकार व्यक्ति को चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति देता है, जबकि चुनाव लड़ने का अधिकार एक अतिरिक्त अधिकार है, जिस पर योग्यता और पात्रता की शर्तें लागू की जा सकती हैं।
हाई कोर्ट का फैसला खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजस्थान हाई कोर्ट ने इस मामले में गलती की थी क्योंकि उसने सहकारी समितियों के आंतरिक चुनावी नियमों को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के रूप में देखा था।
सुप्रीम कोर्ट ने इसे गलत ठहराते हुए कहा कि ऐसी संस्थाओं के आंतरिक चुनाव आम तौर पर संवैधानिक हस्तक्षेप के दायरे में नहीं आते।
क्या है पूरा मामला
यह मामला राजस्थान की सहकारी दुग्ध समितियों के चुनाव से जुड़ा था, जहां उम्मीदवारों की पात्रता को लेकर कुछ शर्तें तय की गई थीं। हाई कोर्ट ने इन शर्तों को असंवैधानिक माना था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें वैध बताया।













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