डेस्क : राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम और सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि खाप पंचायतों और जाति पंचायतों द्वारा जारी किए गए सामाजिक बहिष्कार (सोशल बॉयकॉट) और दंडात्मक फरमान पूरी तरह से असंवैधानिक हैं और ये देश के संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।
कोर्ट ने साफ कहा कि ऐसे गैर-वैधानिक निकाय “समानांतर न्याय व्यवस्था” की तरह काम कर रहे हैं, जो किसी भी कानून के तहत मान्य नहीं हैं और इनका असर सीधे तौर पर नागरिकों की गरिमा, स्वतंत्रता और समानता पर पड़ता है।
11 याचिकाओं पर सुनवाई, कई जिलों के मामले सामने आए
यह फैसला न्यायमूर्ति फरजंद अली की एकल पीठ ने उन 11 याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिया, जिनमें राजस्थान के सिरोही, बाड़मेर, जालोर, नागौर, बालोतरा और जोधपुर जैसे जिलों में सामाजिक बहिष्कार और जबरन दंडात्मक फैसलों की शिकायत की गई थी।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि गांवों और जाति पंचायतों द्वारा “हुक्का-पानी बंद” जैसी प्रथाएं अपनाकर परिवारों को समाज से पूरी तरह अलग-थलग कर दिया जाता है, खासकर उन मामलों में जहां लोग अपनी पसंद से विवाह करते हैं या सामाजिक परंपराओं को चुनौती देते हैं।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी: यह ‘सिविल डेथ’ जैसा
हाईकोर्ट ने कहा कि सामाजिक बहिष्कार की यह प्रथा किसी व्यक्ति के लिए “सिविल डेथ” जैसी स्थिति पैदा कर देती है, जिसमें उसे समुदाय की हर सुविधा और सामाजिक जीवन से वंचित कर दिया जाता है। कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का गंभीर उल्लंघन बताया।
सरकार को कानून और एसओपी बनाने के निर्देश
अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस समस्या से निपटने के लिए स्पष्ट नीति और स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) तैयार करे।
साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि राजस्थान में अभी इस तरह के सामाजिक बहिष्कार को सीधे अपराध मानने वाला कोई ठोस कानून नहीं है, इसलिए महाराष्ट्र जैसे राज्यों की तर्ज पर अलग से कानून बनाने पर विचार किया जाए।
जांच और निगरानी व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश
कोर्ट ने पुलिस प्रशासन को भी निर्देश दिए हैं कि:
- सामाजिक बहिष्कार से जुड़े मामलों की जांच 90 दिनों के भीतर पूरी की जाए
- हर जिले में नोडल अधिकारी नियुक्त किए जाएं
- वरिष्ठ पुलिस अधिकारी इन मामलों की निगरानी करें













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