जयपुर, 4 जून। अजमेर रोड स्थित डॉक्टर्स कॉलोनी में ‘19 नवकार’ निवास पर गुरुवार को आयोजित आध्यात्मिक सत्संग में मुनि श्री तत्त्व रूचि जी “तरुण” ने भगवान महावीर की वाणी का उल्लेख करते हुए कर्म सिद्धांत की गहन व्याख्या की। उन्होंने कहा कि मनुष्य के सुख और दुःख का वास्तविक कर्ता वह स्वयं है तथा अपने जीवन की परिस्थितियों के लिए किसी अन्य को दोषी ठहराना उचित नहीं है।
अपने प्रवचन में मुनि श्री ने कहा कि सुख-दुःख व्यक्ति के शुभ और अशुभ कर्मों का परिणाम है। जो जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि जिसे सुख की कामना है, उसे किसी भी प्राणी को आहत नहीं करना चाहिए, क्योंकि दूसरों को दुःख देकर कभी सुख प्राप्त नहीं किया जा सकता।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि प्रकृति का अटल नियम है कि जैसा बीज बोया जाता है, वैसा ही फल मिलता है। आक का बीज बोकर आम की अपेक्षा नहीं की जा सकती। इसी प्रकार जीवन में किए गए कर्मों का परिणाम अवश्य भोगना पड़ता है।
मुनि श्री ने प्रथम वासुदेव त्रिपृष्ठ के प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि उनके पूर्व जन्मों में किए गए क्रूर कर्मों का फल उन्हें भगवान महावीर के भव में भी भोगना पड़ा। उन्होंने कहा कि कर्म के दरबार में किसी प्रकार का पक्षपात नहीं होता। व्यक्ति अपने कर्मों को भले ही भूल जाए, लेकिन कर्म उसे कभी नहीं भूलता और अपना फल देकर ही शांत होता है।
इस अवसर पर मुनि श्री संभव कुमार जी ने धर्म ध्यान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए प्रेरक गीत प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि धर्म ध्यान के लिए शरीर, मन और इन्द्रियों का स्वस्थ होना आवश्यक है, क्योंकि अस्वस्थता की स्थिति आर्तध्यान का कारण बन सकती है।
कार्यक्रम की शुरुआत तीर्थंकर पद्म प्रभु की स्तुति से हुई। इस दौरान तन, मन और भावों की शुद्धि एवं स्वस्थता के लिए प्रेक्षाध्यान, प्राणायाम तथा आत्मशुद्धि हेतु तप-प्रत्याख्यान के प्रयोग भी कराए गए। अंत में मंगल भावों के साथ मंगल पाठ का उच्चारण किया गया और कार्यक्रम का समापन हुआ।













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