लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, शांतिदूत, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मंगलवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘अशाश्वत आवास’ के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि आत्मा और शरीर दोनों का साहचर्य चलता है। जैन शासन में पांच प्रकार के शरीर बताए गए हैं। इनमें से कार्मण शरीर सूक्ष्मतर होता है, जो आत्मा से इतना समिश्रित होता है कि वह आत्मा के साथ अगले जन्म में भी जाता है। औदारिक शरीर यही छूट जाता है। कार्मण शरीर तो मानों आत्मा के साथ आगे के जन्मों तक साथ जाता रहता है। तैजस शरीर भी सूक्ष्म है जो साथ जाते हैं। इस प्रकार जीव के अगले जन्म में उसकी आत्मा, तैजस शरीर और कार्मण शरीर साथ जाते हैं।
जैन तत्त्व विद्या के माध्यम से इन सूक्ष्म शरीरों को जाना जा सकता है। सिद्ध आत्माओं के साथ कार्मण शरीर नहीं होता है। वहां शुद्ध आत्मा होती है। सांसारिक स्थिति वाली आत्माओं के साथ ही कार्मण शरीर जुड़ा हुआ रहता है। औदारिक व वैक्रिय शरीर स्थूल रूप में होते हैं। ये संसारी जीवों के स्थूल शरीर प्राप्त होते हैं। आहारक शरीर किसी-किसी साधु या साधक के पास होती है, बाकी तो हमेशा साथ रहने वाला शरीर नहीं है। यह पांच शरीरों में सबसे कम रहने वाला शरीर आहारक शरीर होता है।
आगमकार ने इस शरीर की स्थिति को वर्णित करते हुए कहा कि यह शरीर अनित्य है। अनित्य अनुप्रेक्षा का प्रयोग करना हो तो इस शरीर के अनित्यता का विचार किया जा सकता है। यह शरीर अनित्य है, अस्थाई होता है। यह शरीर कभी न कभी छुटने वाला, विनाशधर्मा है। यह इस शरीर की स्थिति है। यह अदौरिक शरीर अशुचि, अपवित्र है। बाहर के गन्दगी से आदमी तो दुराव कर सकता है, लेकिन जो भीतर में गन्दगी पड़ी हुई होती है, उससे दुराव कैसे संभव हो सकता है। कोई गन्दगी कहता है तो कोई पुद्गल भी कह सकता है। आदमी को पुद्गलों के प्रति राग और द्वेष की भावना से बचने का प्रयास करना चाहिए।
यह शरीर अशुचि होने के साथ-साथ इस शरीर की उत्पत्ति भी अशुचि से ही संभव है। यह शरीर आत्मा का अशाश्वत आवास है। शरीर आत्मा का स्थाई आवास नहीं होता। आत्मा को आगे जाना होता है तो यह शरीर छूट जाता है। अंतराल काल में तो कोई शरीर ही नहीं होता। यह शरीर आत्मा का अशाश्वत आवास है।
इस शरीर के संदर्भ में अगली बात बताई गई कि यह शरीर दुःख, क्लेश आदि का भाजन है। इस शरीर में दुःख भी होते हैं और क्लेश भी होते हैं। इस शरीर की अवस्था में ही दुःख की प्राप्ति होती है। बीमारियां भी इस शरीर में होती हैं। आदमी को मानसिक दुःख भी इसी शरीर के माध्यम से ही प्राप्त होता है। इस शरीर से कितना-कितना परिश्रम करना भी होता है। कोई शारीरिक परिश्रम होता है तो कई को दिमागी परिश्रम, मानसिक परिश्रम करना होता है। इस शरीर से अनेक रूपों में श्रम हो सकता है। इस प्रकार आदमी को अपने शरीर का तथ्यात्मक विवरण पता चल सकता है। इस शरीर का स्वभाव ही अनित्यता का है।
यह शरीर मलमय होते हुए भी इसकी विशेषता यह है कि मोक्ष की प्राप्ति के लिए इस शरीर को प्राप्त करना ही एकमात्र साधन है। यह शरीर ही मोक्ष प्राप्ति में सहायक बनती है। इस मानव शरीर को धारण कर साधु-साधक मोक्ष प्राप्ति का प्रयास करते हैं। संत लोग इस शरीर को मात्र इसलिए पोषण प्रदान करते हैं कि इसके माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति हो सके। शरीर की अनित्यता को ध्यान में रखते हुए आत्मकल्याण का प्रयास होना चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरान्त अनेक चारित्रात्माओं ने अपनी जिज्ञासाएं प्रस्तुत कीं, जिसे आचार्यश्री ने उत्तरित किया।












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