डेस्क : दक्षिण-पश्चिम मानसून को लेकर इस वर्ष मौसम विभाग के पूर्वानुमानों में हुए लगातार बदलावों ने आम लोगों से लेकर किसानों तक के बीच कई सवाल खड़े कर दिए हैं। पहले मानसून केरल में सामान्य से पहले पहुंचने का अनुमान जताया गया, फिर तारीखों में संशोधन हुआ और अंततः मानसून निर्धारित अनुमान से कुछ दिन बाद केरल पहुंचा। इस घटनाक्रम के बाद यह चर्चा तेज हो गई कि क्या मौसम विभाग ने कोई बड़ी चूक की है।
हालांकि मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि इसे पूर्वानुमान की विफलता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार मानसून एक अत्यंत जटिल और गतिशील मौसमीय प्रणाली है, जिसकी गति और दिशा समुद्री तापमान, हवाओं की ताकत, नमी की उपलब्धता तथा वायुमंडलीय परिस्थितियों में होने वाले छोटे-छोटे बदलावों से प्रभावित होती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक मई के अंतिम सप्ताह में परिस्थितियां ऐसी थीं कि मानसून के समय से पहले केरल पहुंचने की संभावना मजबूत दिखाई दे रही थी। अरब सागर के ऊपर नमी और बादलों की सक्रियता भी अनुकूल थी, लेकिन बाद में निचले स्तर की पश्चिमी हवाएं कमजोर पड़ गईं और मानसूनी तंत्र की प्रगति धीमी हो गई। परिणामस्वरूप मौसम विभाग को अपने अनुमान में संशोधन करना पड़ा।
इस बीच वैज्ञानिकों ने एक और बड़ी चिंता जताई है। अंतरराष्ट्रीय मौसम एजेंसियों और विश्व मौसम संगठन (WMO) ने चेतावनी दी है कि वर्ष 2026 में अल नीनो (El Niño) की परिस्थितियां मजबूत हो सकती हैं, जिसका असर भारतीय मानसून पर पड़ने की आशंका है। अल नीनो के प्रभाव से वर्षा सामान्य से कम रह सकती है और कई क्षेत्रों में सूखे जैसी परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं।
भारतीय मौसम विभाग ने भी पहले ही संकेत दिया है कि इस वर्ष मानसूनी वर्षा दीर्घकालिक औसत से कम रह सकती है। यदि जुलाई और अगस्त के महत्वपूर्ण महीनों में वर्षा में कमी रहती है तो इसका सीधा असर खरीफ फसलों, जलाशयों के जलस्तर और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
हालांकि राहत की बात यह है कि मानसून ने अब केरल में प्रवेश कर लिया है और आगे बढ़ने के लिए परिस्थितियां अनुकूल बताई जा रही हैं। मौसम विभाग का कहना है कि आने वाले दिनों में मानसून दक्षिण भारत के अन्य हिस्सों में तेजी से आगे बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में मौसम संबंधी घटनाएं पहले की तुलना में अधिक अनिश्चित और चरम होती जा रही हैं। ऐसे में दीर्घावधि पूर्वानुमानों में समय-समय पर संशोधन होना असामान्य नहीं है। वैज्ञानिकों के अनुसार चुनौती पूर्वानुमान प्रणाली की नहीं, बल्कि तेजी से बदल रहे वैश्विक मौसमीय व्यवहार की है।













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