लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने बुधवार को मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के दौरान सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘संसार में दुःख हैं’ को वर्णित कर पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि इस संसार में बहुत दुःख है। दुःख की स्थिति में धर्म की भावना, प्रभु का स्मरण, ईष्ट की आराधना व अच्छा संकल्प भी पैदा हो सकता है। इस कारण कभी-कभी दुःख भी विकास में सहायक बन सकता है। मिथ्यात्व, अव्रत, कषाय आदि सभी दुःख के कारण हैं।
नव तत्त्व के संदर्भ में पाप तत्त्व दुःख हैं और आश्रव तत्त्व दुःख के कारण हैं। प्रश्न हो सकता है कि क्या आदमी को दुःख में ही रहना होगा या दुःख मुक्ति भी कोई चीज है? इसका उत्तर प्रदान किया गया कि दुःख से मुक्ति हो सकती है। नव तत्त्वों में नवां तत्त्व मोक्ष है, वह दुःख मुक्ति का मार्ग है। मोक्ष अपने आप में दुःखमुक्ति है। पाप तत्त्व दुःख, आश्रव दुःख के कारण और दुःखमुक्ति मोक्ष है। दुःखमुक्ति का कारण है संवर और साथ में निर्जरा भी जुड़ जाती है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि संवर और निर्जरा के माध्यम से दुःख से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं।
आगम में चार प्रकार के दुःख बताए गए हैं। इनमें पहला है-जन्म। जन्म लेना भी दुःख है। बुढ़ापा को भी दुःख बताया गया है। साठ वर्ष के बाद जीव को स्थवीर कहा जाता है। कहा भी गया है कि जब तक बुढ़ापा पीड़ित न करने लगे, तब तक आदमी को धर्म कर लेना चाहिए। इसी प्रकार बीमारी भी दुःख है। आदमी को बुढ़ापा आए अथवा नहीं, लेकिन बीमारी तो कभी भी आ सकती है। बीमारी क्या बच्चा, क्या जवान और क्या बुजुर्ग, बीमारी किसी को भी हो सकती है। दुनिया में बीमारियां न भी लगे तो बहुत अच्छी बात हो सकती है। बीमारी का प्रतिकार किया जाए और बीमारी में भी समता, शांति बनी रहे, ऐसा प्रयास करना चाहिए।
इसी प्रकार मृत्यु को भी दुःख कहा गया है। दुनिया में जो भी जीव है, वह मरना कब चाहता है। जब मृत्यु निकट आती है अथवा मृत्यु तुल्य कोई कष्ट हो तो उससे भी जीव दुःखी बनते हैं। मृत्यु में भी समता और निर्भिकता रहे। इस प्रकार यह संसार ही दुःख है, जहां प्राणी दुःख पाते हैं। ऐसे संसार में जो दुःख मुक्ति की साधना करे, निर्जरा की साधना करे, वह विशेष बात होती है। संवर और निर्जरा की साधना के लिए संन्यास लेना आवश्यक है। आदमी को अपने जीवन में कभी संन्यास को स्वीकार कर अपनी आत्मा का कल्याण करने और दुःखमुक्ति के मार्ग पर बढ़ने का प्रयास करना चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं को अपनी जिज्ञासाओं को प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया। प्रस्तुत जिज्ञासाओं को आचार्यश्री ने उत्तरित किया।













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