डेस्क : डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को कड़ी चेतावनी देने के बाद अचानक घोषित किए गए संघर्षविराम ने अमेरिकी राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। इस अस्थायी युद्धविराम के तहत अमेरिका ने ईरान पर अपने हमले रोकने का फैसला किया है, लेकिन ईरान ने साफ किया है कि यह केवल दो सप्ताह की सहमति है और संघर्ष पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। ऐसे में स्थिति अब भी अनिश्चित बनी हुई है।
संघर्षविराम के इस फैसले के बाद ट्रंप को अपने ही समर्थकों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी इस मुद्दे पर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं।
ट्रंप की कट्टर समर्थक लारा लूमर ने इस समझौते को पूरी तरह विफल करार दिया है। उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा कि इस समझौते से अमेरिका को कोई ठोस लाभ नहीं मिला, जबकि ईरान में जश्न का माहौल है। उन्होंने यह भी कहा कि विरोधी समूह इस फैसले का इस्तेमाल ट्रंप के खिलाफ कर रहे हैं और इसे उनकी कमजोरी के रूप में पेश किया जा रहा है।
लूमर ने आगे चेतावनी दी कि यह संघर्षविराम ज्यादा समय तक टिक नहीं पाएगा। उनके अनुसार, ईरानी शासन के खिलाफ कड़े कदम जरूरी हैं, लेकिन वर्तमान में ट्रंप गलत दिशा में जा रहे हैं।
वहीं दूसरी ओर, रिक स्कॉट ने इसे शांति की दिशा में सकारात्मक कदम बताया। उनका कहना है कि मजबूत नेतृत्व के जरिए ही स्थिरता हासिल की जा सकती है। इसके विपरीत लिंडसे ग्राहम ने इस समझौते को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि इसकी पूरी जानकारी सामने आना अभी बाकी है, इसलिए संसदीय स्तर पर गहन समीक्षा जरूरी है।
इससे पहले ट्रंप ने ईरान के बुनियादी ढांचे—विशेष रूप से पुलों और बिजली संयंत्रों—पर बड़े हमलों की चेतावनी दी थी, लेकिन तय समयसीमा समाप्त होने से ठीक पहले उन्होंने संघर्षविराम की घोषणा कर दी। इस समझौते में होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने का मुद्दा भी शामिल है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति के लिहाज से बेहद अहम है।
उधर, ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने पुष्टि की है कि वह इस अस्थायी संघर्षविराम को स्वीकार करता है और आगे की वार्ता के लिए इस्लामाबाद में अमेरिकी प्रतिनिधियों से बातचीत करेगा। हालांकि, दोनों देशों की ओर से अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि संघर्षविराम प्रभावी कब से होगा।
इस बीच, क्षेत्र में तनाव पूरी तरह कम नहीं हुआ है। बुधवार को भी इजरायल, ईरान और खाड़ी क्षेत्र में हमलों की खबरें सामने आई हैं, जिससे यह साफ है कि हालात अभी भी नाजुक बने हुए हैं।













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