डेस्क : अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आयोजित बहुप्रतीक्षित उच्चस्तरीय वार्ता बिना किसी ठोस समझौते के समाप्त हो गई। लगभग 21 घंटे तक चली इस मैराथन बातचीत के बाद दोनों देशों ने एक-दूसरे पर विफलता का ठीकरा फोड़ा, जिससे क्षेत्रीय तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
ईरान ने साफ तौर पर कहा कि वार्ता इसलिए असफल रही क्योंकि अमेरिका ने “अवास्तविक और अनुचित मांगें” सामने रखीं, जिन्हें स्वीकार करना उसकी संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों के खिलाफ था। वहीं, अमेरिका ने दावा किया कि उसने समझौते के लिए “अंतिम और सर्वोत्तम प्रस्ताव” पेश किया था, लेकिन ईरान ने उसे ठुकरा दिया।
क्या थीं अमेरिका की प्रमुख मांगें?
सूत्रों के अनुसार, अमेरिका ने ईरान के सामने कई सख्त शर्तें रखीं, जिनमें शामिल थीं:
- परमाणु हथियार विकसित न करने की ठोस और स्थायी गारंटी
- परमाणु कार्यक्रम पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी और नियंत्रण
- बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर सीमाएं
- क्षेत्रीय सैन्य गतिविधियों, खासकर पश्चिम एशिया में प्रभाव को सीमित करना
ईरान ने इन मांगों को अपनी स्वतंत्र नीति और रक्षा अधिकारों में हस्तक्षेप बताते हुए अस्वीकार कर दिया।
किन मुद्दों पर नहीं बनी सहमति?
वार्ता के दौरान कई अहम और संवेदनशील मुद्दों पर गतिरोध बना रहा, जैसे:
- होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री नियंत्रण और तेल आपूर्ति की सुरक्षा
- ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने का सवाल
- युद्ध से जुड़े संभावित मुआवजे (Reparations)
- परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम पर सीमाएं
- लेबनान और अन्य क्षेत्रों में जारी संघर्ष
इन सभी मुद्दों पर दोनों पक्षों के रुख में बड़ा अंतर बना रहा, जिसके चलते समझौते की कोई जमीन तैयार नहीं हो सकी।
अमेरिका का बयान
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने वार्ता के बाद कहा कि अमेरिका ने “अपनी सभी शर्तें स्पष्ट कर दी थीं” और ईरान को समझौते के लिए पर्याप्त अवसर दिए गए थे।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि समझौता न होने की स्थिति ईरान के लिए अधिक नुकसानदायक साबित हो सकती है।
ईरान की प्रतिक्रिया
ईरान के अधिकारियों ने अमेरिकी रुख को “दबाव की राजनीति” करार देते हुए कहा कि वे किसी भी ऐसी शर्त को स्वीकार नहीं करेंगे जो उनकी संप्रभुता, सुरक्षा और क्षेत्रीय भूमिका को कमजोर करे।
क्यों अहम थी यह वार्ता?
- यह बातचीत ऐसे समय हुई जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है
- पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई
- वार्ता से पहले एक अस्थायी युद्धविराम लागू था, जिस पर अब खतरा मंडरा रहा है
विशेषज्ञों के अनुसार, यह वार्ता दोनों देशों के बीच हाल के वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल थी, जिससे क्षेत्र में स्थिरता की उम्मीद की जा रही थी।
आगे क्या?
वार्ता विफल होने के बाद अब कई आशंकाएं सामने आ रही हैं:
- क्षेत्र में सैन्य तनाव और बढ़ सकता है
- युद्धविराम टूटने की संभावना
- वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर पड़ सकता है
- भविष्य में नई वार्ता की संभावना बनी रहेगी, लेकिन शर्तों पर गतिरोध जारी है













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