पहले शीत युद्ध और फिर यूक्रेन में महायुद्ध को लेकर अमेरिका जहां पहले रूस की विस्तारवादी नीतियों के खिलाफ मजबूती से खड़ा था, डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने के बाद अमेरिका का रुख तेजी से बदला है। ट्रंप को शपथ लिए मुश्किल से एक महीना भर हुआ है, उनकी व्लादिमीर पुतिन संग जुगलबंदी ऐसी दिख रही है, मानो सदियों पुराने दोस्त हों। हाल ही में यूक्रेन को लेकर ट्रंप के रुख और रूस की तरफदारी ने दुनिया को चिंता में डाल दिया है। यूरोप डरा हुआ है कि कहीं ट्रंप और पुतिन यूक्रेन को लेकर कोई बड़ी डील न कर दे। रूस और अमेरिका की बढ़ती नजदीकियां भारत के लिए सिरदर्द साबित होंगी या कूटनीतिक वरदान, आइए समझते हैं।
न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, ट्रंप की रूस के प्रति नई नीति अमेरिका के पारंपरिक सहयोगियों को छोड़कर रूस से संबंध सुधारने की ओर इशारा करती है। ट्रंप प्रशासन के इस बदले रुख से यूरोप चिंतित है। अमेरिका और रूस के अधिकारी सऊदी अरब में राजनयिक और आर्थिक संबंध मजबूत करने के लिए मिले, जिससे रूस संतुष्ट दिखा। हालांकि, यूक्रेनी राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने ट्रंप की बयानबाजी को पुतिन के प्रभाव का नतीजा बताया। फिनलैंड के राष्ट्रपति समेत कई यूरोपीय नेताओं का मानना है कि यदि अमेरिका ने यूक्रेन का समर्थन छोड़ा, तो रूस और आक्रामक हो सकता है।
नाटो कमजोर, रूस को फायदा
द इकोनॉमिस्ट के अनुसार, ट्रंप की नीतियां नाटो को कमजोर कर सकती हैं, जिससे यूरोप की सुरक्षा को खतरा बढ़ेगा। अगर अमेरिका नाटो सहयोगियों की रक्षा से पीछे हटता है, तो रूस को पूर्वी यूरोप में अपनी पकड़ मजबूत करने का अवसर मिल सकता है। वहीं, ट्रंप के यूक्रेन विरोधी रुख से रूस को सीधा फायदा हो रहा है, क्योंकि वे प्रतिबंध हटाने और यूक्रेन को नाटो में शामिल न करने की बात कर चुके हैं।
भारत का पक्ष
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सोमवार को यूक्रेन के उस प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। जिसमें आक्रमण के तीन साल पूरे होने पर यूक्रेन से सभी रूसी सैनिकों की तत्काल वापसी की मांग की गई है। कुल 193 सदस्यीय विश्व निकाय में 93 सदस्यों ने इसके पक्ष में मतदान किया जबकि 18 ने विरोध किया। भारत सहित 65 सदस्य मतदान से अनुपस्थित रहे। रूस और यूक्रेन मसले को लेकर भारत का पक्ष शुरू से तटस्थ रहा है। भारत भले ही रूस को अपना सबसे अजीज दोस्त बुलाता है, लेकिन सार्वजनिक तौर पर कभी यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस का समर्थन नहीं किया। भारत ने कूटनीतिक और बातचीत के जरिए युद्ध का समाधान निकालने की कई बार बात जरूर कही है।
पिछले साल पीएम नरेंद्र मोदी ने रूस और यूक्रेन दोनों देशों के शीर्ष नेताओं से मुलाकात की थी। पहले रूसी नेता पुतिन से मॉस्को में गले लगे और फिर यूक्रेन जाकर जेलेंस्की को ढाढस बंधाया। भारत का यह रुख दर्शाता है कि उसके इस युद्ध का समाधान निकालने में दिलचस्पी है।
अमेरिका और रूस की दोस्ती से भारत को फायदा?
भारत और रूस के बीच रिश्ते शुरू से सामरिक और व्यापारिक रूप से मजबूत रहे हैं। दोनों देशों के बीच 2023-24 में तकरीबन 65 अरब डॉलर का व्यापार है। 2030 तक व्यापार 100 बिलियन डॉलर तक बढ़ने की उम्मीद है। यूरोपीय देशों द्वारा तमाम पाबंदी लगाने के बाद भारत ने रूस से कम कीमत में तेल खरीदना शुरू किया है। इससे भारत को फायदा ही मिल रहा है।
अमेरिका और रूस के बीच बढ़ती दोस्ती भारत के लिए चीन के परिपेक्ष्य से भी फायदेमंद हो सकती है। अमेरिका और चीन के बीच तनाव किसी से छिपा नहीं, हाल ही में ट्रंप ने चीन के कुछ सामानों पर टैरिफ बढ़ाने का ऐलान किया था। पिछले कार्यकाल में भी ट्रंप चीन के आलोचक ही रहे। कोरोना वायरस के लिए ट्रंप ने चीन को दोषी ठहराया है और वायरस को चीनी वायरस भी कहा था। विशेषज्ञों का कहना है कि रूस और अमेरिका की दोस्ती से संभव है कि पुतिन का चीन की तरफ झुकाव कम हो, जो भारत के लिए फायदा ही देगा।
जानकार बताते हैं कि रूस और अमेरिका के बीच बेहतर रिश्ते से वैश्विक शक्ति संतुलन में स्थिरता आ सकती है। भारत इन दोनों शक्तियों के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को मजबूत कर सकता है। अगर दोनों देश आपस में अच्छे संबंध बनाते हैं, तो भारत को व्यापार और रक्षा क्षेत्र में नई संभावनाएं मिल सकती हैं। अमेरिका से सैन्य तकनीकी सहयोग और रूस से सस्ते रक्षा उपकरणों की आपूर्ति को भारत बेहतर तरीके से संतुलित कर सकता है।
रूस संग अच्छे संबंध से भारत को ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों की बेहतर आपूर्ति मिल सकती है, खासकर गैस और तेल के क्षेत्र में। अमेरिका से इस संबंध में सहायता मिल सकती है, जिससे भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित हो सकती है।