डेस्क : पश्चिम बंगाल में कांग्रेस इस बार अपने दम पर चुनावी मैदान में उतरकर दशकों बाद खुद को एक वैकल्पिक शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है। पार्टी ने व्यापक विकास के वादों के साथ अपना चुनावी घोषणा पत्र जारी किया है और लगभग तीन दशक बाद राज्य की सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। हालांकि, संगठनात्मक कमजोरी के कारण कई क्षेत्रों में पार्टी के पास जमीनी कार्यकर्ताओं की भारी कमी दिखाई दे रही है।
विशेषकर उन क्षेत्रों में, जहां लंबे समय से वाम मोर्चा और तृणमूल कांग्रेस का दबदबा रहा है और जहां कांग्रेस ने पहली बार उम्मीदवार उतारे हैं, वहां चुनावी संदेश को जनता तक पहुंचाने की चुनौती सामने आ रही है। वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस मात्र लगभग तीन प्रतिशत वोट हासिल कर पाई थी और अपना खाता भी नहीं खोल सकी थी। इसी कारण पार्टी इस बार बेहद सतर्क रणनीति के साथ आगे बढ़ रही है।
कांग्रेस का मुख्य फोकस अपने पुराने मजबूत गढ़ रहे मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर जैसे क्षेत्रों पर केंद्रित है। इन इलाकों में पार्टी अपनी पकड़ दोबारा मजबूत करने की कोशिश में जुटी है।
बहरामपुर सीट से वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी को मैदान में उतारा गया है, जबकि मालदा क्षेत्र में संगठन को मजबूत करने के उद्देश्य से मौसम नूर को मालतीपुर सीट से उम्मीदवार बनाया गया है। पार्टी को उम्मीद है कि राज्य की सभी सीटों पर चुनाव लड़ने से उसका वोट प्रतिशत बढ़ेगा और भविष्य के लिए एक नई राजनीतिक जमीन तैयार होगी।
राजनीतिक रणनीतिकारों का मानना है कि कांग्रेस कुछ पारंपरिक गढ़ों में सीमित सीटें जीतकर पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू कर सकती है, लेकिन साथ ही पार्टी यह भी सावधानी बरत रही है कि उसके विस्तार से तृणमूल कांग्रेस को कोई बड़ा नुकसान न हो। क्योंकि तृणमूल कांग्रेस वर्तमान में विपक्षी गठबंधन का हिस्सा है और भाजपा के साथ सीधा मुकाबला कर रही है।
इसी संतुलन को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस अपनी चुनावी रणनीति बेहद सावधानी से तय कर रही है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा के चुनावी कार्यक्रमों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। पार्टी का ध्यान उन क्षेत्रों पर अधिक रहेगा, जहां जीत की संभावना अपेक्षाकृत बेहतर मानी जा रही है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2021 और 2024 में राहुल गांधी ने बंगाल में प्रचार अभियान में सक्रिय भागीदारी नहीं की थी।
बंगाल में खोई हुई राजनीतिक जमीन की तलाश
वर्ष 1972 के बाद से पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का प्रदर्शन लगातार कमजोर होता गया है। उस समय पार्टी ने 200 से अधिक सीटों पर जीत दर्ज की थी, लेकिन 1977 के बाद आए राजनीतिक बदलाव के बाद कांग्रेस राज्य में अपनी पकड़ बनाए रखने में असफल रही। 2011 में पार्टी को 42 सीटें और 2016 में 44 सीटें प्राप्त हुई थीं, लेकिन इसके बाद उसका प्रभाव लगातार घटता गया।
इंडिया गठबंधन के समीकरणों को भी साधने की कोशिश
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच मुकाबला काफी करीबी माना जा रहा है। मतदाता सूची पुनरीक्षण के बाद बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के मुद्दे ने भी राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। ऐसे में कांग्रेस यह सुनिश्चित करना चाहती है कि उसके कदमों से गठबंधन की प्रमुख सहयोगी तृणमूल कांग्रेस की स्थिति कमजोर न हो, क्योंकि वह इंडिया गठबंधन का हिस्सा है।













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