नई दिल्ली : पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान से जुड़ी घटनाओं के बीच भारत की विदेश नीति को लेकर देश की राजनीति भी गरमा गई है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार से मांग की है कि भारत को इस मुद्दे पर स्पष्ट और सख्त रुख अपनाते हुए ईरान के पक्ष में खड़ा होना चाहिए। विपक्ष का कहना है कि ईरान पर हुए हमले और वहां के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या की खबरों के संदर्भ में भारत सरकार को संवेदनशीलता और दृढ़ता दोनों दिखानी चाहिए।
विपक्षी दलों का तर्क है कि इस तरह की अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर भारत को केवल तटस्थ बयान देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि मानवीय और कूटनीतिक दृष्टि से स्पष्ट प्रतिक्रिया देनी चाहिए। इसी मुद्दे पर संसद में चर्चा कराने की मांग भी विपक्ष की ओर से उठाई जा रही है, ताकि सरकार का आधिकारिक रुख देश के सामने स्पष्ट हो सके।
इसी संदर्भ में कांग्रेस ने वर्ष इराक युद्ध के दौरान संसद में पारित हुए एक प्रस्ताव की याद दिलाई है। उस समय अमेरिका द्वारा इराक पर किए गए हमले के विरोध में भारतीय संसद में एक प्रस्ताव लाया गया था, जिसमें इराक के प्रति सहानुभूति और समर्थन व्यक्त किया गया था।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इसी प्रस्ताव की प्रति सोशल मीडिया मंच X पर साझा करते हुए कहा कि उस समय भारत ने मानवीय आधार पर इराक की मदद का निर्णय लिया था। उन्होंने याद दिलाया कि उस प्रस्ताव के बाद भारत सरकार ने इराक को लगभग 100 करोड़ रुपये की सहायता दी थी, जिसमें नकद सहायता के साथ-साथ खाद्यान्न और अन्य आवश्यक सामग्री भी शामिल थी।
कांग्रेस का कहना है कि उस समय भारत ने वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद मानवीय दृष्टिकोण अपनाया था, इसलिए आज भी सरकार को इसी प्रकार संवेदनशील और स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।
वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम एशिया की जटिल परिस्थितियों को देखते हुए भारत के लिए संतुलित कूटनीतिक नीति बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि भारत के संबंध ईरान के साथ-साथ अमेरिका और खाड़ी देशों से भी महत्वपूर्ण हैं।
फिलहाल विपक्ष इस मुद्दे पर संसद में व्यापक चर्चा की मांग कर रहा है, जबकि सरकार की ओर से अब तक इस विषय पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।













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