डेस्क : भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने नेशनल फोरेंसिक साइंस यूनिवर्सिटी (NFSU) के चौथे समागम में स्नातक छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि फोरेंसिक विज्ञान को न्याय प्रणाली के लिए एक “रक्षा कवच” के रूप में बनाए रखना चाहिए, जो न्याय की साख और अखंडता की रक्षा करता है।
CJI ने डिजिटल युग में फोरेंसिक विज्ञान के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा, “डिजिटल युग ने केवल अपराध करने के तरीकों को ही नहीं बदला, बल्कि सच्चाई खोजने के तरीके को भी बदल दिया है। साइबर अपराध, डिजिटल धोखाधड़ी, पहचान हेरफेर और अंतरराष्ट्रीय डेटा अपराध पारंपरिक जांच मॉडल को चुनौती देते हैं, और इसके लिए नए स्तर की विश्लेषणात्मक दक्षता आवश्यक है। ऐसे वातावरण में फोरेंसिक विज्ञान केवल तकनीकी विषय नहीं रह जाता, बल्कि यह न्याय की साख की रक्षा करने वाला कवच बन जाता है।”
उन्होंने यह भी कहा कि न्यायालय अब उन पेशेवरों पर अधिक निर्भर करते हैं, जो वैज्ञानिक जटिलताओं और कानूनी मानकों के बीच संतुलन बना सकते हैं, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक सबूत का मूल्यांकन या तकनीकी रूप से उन्नत विवादों को संभालने में।
CJI ने आगे कहा, “आपकी विशेषज्ञता न्यायिक प्रणाली को स्थिर करने में सहायक होती है और सुनिश्चित करती है कि तकनीकी प्रगति कानून के शासन को कमजोर न करे, बल्कि उसे मजबूत करे। जब फोरेंसिक विज्ञान एक ‘रक्षा कवच’ के रूप में कार्य करता है, तो यह केवल व्यक्तिगत विवादों का समाधान नहीं करता, बल्कि संस्थागत वैधता को बनाए रखता है। जटिल डिजिटल साक्ष्य की व्याख्या में आपका स्थिरीकरणीय योगदान सार्वजनिक विश्वास को आपके हाथों में रखता है।”
समापन में CJI ने स्नातकों से कहा, “जैसे ही आप इन दीवारों से बाहर निकलेंगे, आप उस समुदाय में शामिल होंगे जो सुनिश्चित करता है कि भारत में न्याय सिद्धांतपूर्ण और सटीक बना रहे। सत्य की खोज बौद्धिक अनुशासन के साथ करें, ज्ञान का प्रयोग नैतिक स्पष्टता के साथ करें, और सुनिश्चित करें कि फोरेंसिक विज्ञान न्याय की अखंडता की रक्षा करने वाला ‘रक्षा कवच’ बनी रहे।”













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