पोर्ट लुईस: एस. जयशंकर ने शुक्रवार को हिंद महासागर क्षेत्र के देशों के लिए पांच प्रमुख प्राथमिकताएं रेखांकित करते हुए कहा कि वैश्विक व्यवस्था के अधिक अस्थिर होने की आशंका के बीच क्षेत्रीय सहयोग और सामूहिक लचीलापन मजबूत करना समय की आवश्यकता है।
मॉरीशस में आयोजित 9वें इंडियन ओशन कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए जयशंकर ने कहा कि हिंद महासागर केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि एक “जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र” है, जो अर्थव्यवस्थाओं, आजीविका, कनेक्टिविटी, संसाधनों और साझा सांस्कृतिक विरासत को संबल देता है। उन्होंने चेतावनी दी कि इस परस्पर जुड़े तंत्र में किसी भी प्रकार का व्यवधान दूरगामी प्रभाव डाल सकता है, इसलिए समुद्री क्षेत्र में स्थिरता और संतुलित प्रबंधन आवश्यक है।
अपने दूसरे बिंदु में उन्होंने कहा कि क्षेत्र के देशों को उपनिवेशकालीन विरासत से मिले कृत्रिम अवरोधों को दूर करने के प्रयास जारी रखने होंगे। इसके लिए गहरे क्षेत्रीय सहयोग, मजबूत आर्थिक संबंध, बेहतर कनेक्टिविटी और पारंपरिक रिश्तों के पुनर्जीवन पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि बढ़ती वैश्विक विखंडन की प्रवृत्ति के बावजूद दीर्घकालिक सामूहिक लक्ष्यों से नजर नहीं हटनी चाहिए।
तीसरे बिंदु में जयशंकर ने बदलती वैश्विक व्यवस्था की ओर संकेत करते हुए कहा कि दुनिया अब अधिक प्रतिस्पर्धी, अंतर्मुखी और खंडित हो गई है। उन्होंने कहा कि वैश्वीकरण के लाभों पर अब “परस्पर निर्भरता के हथियारीकरण” की प्रवृत्ति हावी होती जा रही है, जिसके चलते देश अधिक भरोसेमंद साझेदारों और मजबूत लचीलापन की तलाश कर रहे हैं।
“चोक पॉइंट्स” के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि जहां समुद्री चोक पॉइंट्स पारंपरिक रूप से महत्वपूर्ण रहे हैं, वहीं अब वित्त, प्रौद्योगिकी, संसाधन और ज्ञान जैसे क्षेत्रों में भी इसी प्रकार की बाधाएं उभर रही हैं। उन्होंने आगाह किया कि नियंत्रित व्यवस्थाएं वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बाधक बन सकती हैं और अधिक खुली एवं लचीली व्यवस्थाओं की आवश्यकता है।
अंतिम बिंदु में उन्होंने हिंद महासागर क्षेत्र के देशों के बीच गहरे सहयोग का आह्वान करते हुए इसे “ग्लोबल साउथ का महासागर” बताया। उन्होंने कहा कि खाद्य, ईंधन और उर्वरक संकट, प्राकृतिक आपदाओं से निपटना और संघर्षों के दुष्प्रभाव जैसी साझा चुनौतियों का समाधान सामूहिक लचीलापन में ही निहित है।
जयशंकर ने कहा कि भारत की नीति “नेबरहुड फर्स्ट” दृष्टिकोण और व्यापक समुद्री रणनीति पर आधारित है, जो क्षेत्रीय सहयोग को प्राथमिकता देती है। उन्होंने यह भी कहा कि विश्व इस समय गहरे बदलाव के दौर से गुजर रहा है, जहां शक्ति संतुलन में परिवर्तन, जारी संघर्ष और आर्थिक विखंडन जैसी चुनौतियां सामने हैं।
पश्चिम एशिया में जारी तनाव का उल्लेख करते हुए उन्होंने इसके मानवीय और आर्थिक प्रभावों पर चिंता जताई। उन्होंने नागरिकों की सुरक्षा और समुद्री आवागमन की निर्बाधता बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि ऐसे संघर्ष ऊर्जा कीमतों, व्यापार प्रवाह और वैश्विक खाद्य सुरक्षा को भी प्रभावित करते हैं।
विदेश मंत्री 9-10 अप्रैल तक मॉरीशस के दौरे पर हैं और इसके बाद 11 अप्रैल को वे संयुक्त अरब अमीरात जाएंगे, जहां वह यूएई नेतृत्व के साथ व्यापक रणनीतिक साझेदारी की समीक्षा करेंगे।













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