जयपुर : जयपुर के निर्माण नगर स्थित महाप्रज्ञ इंटरनेशनल स्कूल में आयोजित आध्यात्मिक प्रवचन माला के दौरान मुनिश्री तत्त्वरुचि ‘तरुण’ ने आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी समस्या ‘तनाव’ का समाधान प्रस्तुत किया। शुक्रवार को आयोजित इस धर्मसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि असीमित इच्छाएं ही मानसिक दबाव और दुखों का मूल कारण हैं।
इच्छाओं का कोई अंत नहीं
जैन शास्त्रों का उल्लेख करते हुए मुनिश्री ने गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि मनुष्य की इच्छाएं आकाश की तरह अनंत हैं।
“संसार में इच्छाओं की पूर्ति करते-करते जीवन का अंत तो आ जाता है, लेकिन इच्छाओं का अंत कभी नहीं होता। जो व्यक्ति वास्तव में शांति चाहते हैं, उन्हें अपनी कामनाओं पर संयम की लगाम लगानी ही होगी।”
मुनिश्री ने जोर देकर कहा कि मन को समझाना और विवेकपूर्ण निर्णय लेना ही सुख-शांति का एकमात्र मार्ग है। कामनाओं से मुक्ति की भावना ही मनुष्य को वास्तविक आनंद की ओर ले जाती है।
भटकाव का कारण है अनियंत्रित मन
कार्यक्रम में मुनिश्री संभव कुमार जी ने भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि आज के समय में मनुष्य के भीतर जो बेचैनी और असंतोष दिखाई देता है, उसका कारण हमारी वे इच्छाएं हैं जिन पर हमारा नियंत्रण नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जीवन के सम्यक् (सही) विकास के लिए संयम और संतोष को अपनाना अनिवार्य है।
भक्ति और ध्यान से सजी धर्मसभा
इस आध्यात्मिक समागम की शुरुआत तीर्थंकर विमल प्रभु की भक्तिमय स्तुति के साथ हुई। प्रवचन के साथ-साथ सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने निम्नलिखित अनुष्ठानों में भाग लिया:
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प्रेक्षाध्यान: मानसिक एकाग्रता और शांति के लिए ध्यान का सामूहिक अभ्यास किया गया।
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तप-त्याग: कई श्रावकों ने मुनिश्री के सानिध्य में तप और त्याग के नियम अंगीकार किए।
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मंगल पाठ: कार्यक्रम का समापन ‘मंगल, उत्तम और शरण’ के मंत्रोच्चार के साथ हुआ, जिससे पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया।













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