जयपुर :देवी नगर, प्लाट नंबर 190 (शर्मा निवास) में शनिवार को आयोजित धर्म सभा में मुनि श्री तत्त्व रुचि जी “तरुण” ने उपस्थित जनों को जीवन में भय और प्रमाद से मुक्त रहने की महत्वपूर्ण शिक्षा दी।
मुनि श्री तत्त्व रुचि जी “तरुण” ने कहा, “डर और भय प्रमादी को सताता है, अप्रमादी भयमुक्त होता है।” उन्होंने समझाया कि जो व्यक्ति गफलत में रहता है और अपने कर्मों में प्रमादी होता है, उसे बाद में पछताना पड़ता है। वहीं, निश्चिंत और सतर्क रहने वाला व्यक्ति भयमुक्त रहता है।
मुनि श्री जी ने यह भी कहा कि पाप का मूल प्रमाद है और पाप कर्म करने वाले व्यक्ति को अंततः संताप का सामना करना पड़ता है। इस अवसर पर उन्होंने “कनक रेखा” नामक गेय व्याख्यान का वाचन किया, जिसमें जीवन को सही मार्ग पर ले जाने की प्रेरणा दी गई।
कार्यक्रम में मुनि श्री संभव कुमार जी ने “क्यों करो कर्ज कर्मा रो” गीत का संगान कर बुरे कर्मों से बचने का संदेश दिया।
ज्ञात रहे कि मुनिद्वय के सान्निध्य में प्रातः और रात्रि दोनों समय प्रवचन कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। शुक्रवार की रात को मुनि श्री तत्त्व रुचि जी “तरुण” ने अपने प्रवचन में बताया कि क्रोध, ईर्ष्या, अकृतज्ञता और दुराग्रह व्यक्ति के विकास में बाधक हैं। इसके विपरीत, क्षमा, प्रमोद भावना, उपकारी के प्रति आभार और विनम्रता हमें उन्नति की ओर ले जाते हैं।
मुनि श्री जी ने “विक्रम राजा” पर आधारित व्याख्यान की शुरुआत करते हुए सज्जन बनने की प्रेरणा दी। रात्रिकालीन कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं के साथ-साथ छात्र-छात्राएं भी उपस्थित थीं, जिन्होंने धर्म और आध्यात्मिकता के प्रति अपनी श्रद्धा और उत्साह व्यक्त किया।
यह धर्म सभा कार्यक्रम उपस्थित जनों के लिए भय और प्रमाद से मुक्त, सशक्त और सदाचारी जीवन जीने की सीख लेकर गया।













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