तेहरान: अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने जब साल 2003 में इराक पर हमले का आदेश दिया तो US आर्मी को सद्दाम हुसैनी की सेना को खत्म करने में सिर्फ 26 दिन लगे थे। शायद वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर हमले की योजना को मंजूरी देते हुए शायद ऐसा ही कुछ सोचा रहा होगा, लेकिन अभी तक ईरान के कमजोर होने के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं। इसकी वजह वह शख्स है, जिसने इराक युद्ध के दौरान ही तय कर लिया था कि अगर ईरान पर हमला होता है तो वह इसे सद्दाम हुसैन की तरह ढहने नहीं देगा। वह शख्स हैं, ईरान की एलीट फोर्स IRGC के पूर्व चीफ मेजर जनरल मोहम्मद अली जाफरी।
अमेरिका और इजरायल की सेनाओं ने 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ एक संयुक्त सैन्य अभियान शुरू किया। यह बड़े पैमाने पर चलाया गया अभियान था, जिसमें ईरान के शीर्ष स्तरों को निशाना बनाने के लिए लड़ाकू विमानों, ड्रोनों और मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया। इन हमलों में सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई, IRGC के कमांडर इन चीफ मेजर जनरल मोहम्मद पाकपुर, रक्षा मंत्री अजीज नासिरजादेह समेत वरिष्ठ अधिकारी मारे गए।
ईरान में अमेरिका के मंसूबे पर ग्रहण
इसका हमलों का मकसद ईरान पर एक तेज और निर्णायक हमला करके शासन को नष्ट करना था, लेकिन इजरायल और अमेरिका ने जैसा सोचा था वैसा नहीं हुआ। दो सप्ताह बीत जाने के बाद भी ईरान जमा हुआ है और पूरी ताकत से हमले कर रहा है। इसने युद्ध की आग को पूरे मध्य पूर्व में पहुंचा दिया है। ईरान के मजबूती से जमे रहने के पीछे मोजेक डिफेंस सिद्धांत है, जिसका मकसद यह पक्का रखना है कि अगर ईरान का नेतृत्व पूरी तरह से खत्म हो जाए तो भी जंग जारी रहे। इस सिद्धांत को मोहम्मद अली जाफरी ने तैयार किया था। जाफरी ने इस सिद्धांत की योजना इराक युद्ध के समय से ही बनानी शुरू कर दी थी। इसके तहत उन्होंने ईरानी सैन्य बल को विकेंद्रीकृत करने पर काम किया।
इराक युद्ध से सबक
जाफरी 2005 IRGC के सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक स्टडीज का नेतृत्व कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने इराक युद्ध का अध्ययन करते हुए एक अहम सबक सीखा। उन्होंने पाया कि सद्दाम हुसैन की नाकामी की वजह उनकी अत्यधिक केंद्रीकृत कमान थी। इसका मतलब था कि टॉप लीडरशिप को खत्म करने पर फोर्स सरकटे धड़ की तरह हो जाती है।
इसका हल निकालने के लिए जाफरी ने IRGC के लिए 31 स्वतंत्र कमांड बनाईं। हर कमान एक आत्मनिर्भर इकाई थी, जो पहले से तय योजना के आधार पर काम करने में सक्षम थी। इसके पास अपने मिसाइल और ड्रोन बेड़े रखे गए। यह किसी निर्णायक जीत की योजना नहीं, बल्कि ऐसी रणनीति है जो हार को असंभव बना देती है।
कौन हैं मेजर जनरल मोहम्मद अली जाफरी?
जनरल जाफरी ने अपना करियर ईरान की एलीट फोर्स IRGC में एक इंटेलिजेंस यूनिट में शुरू किया था। जाफरी ने 1979 से 1989 तक चले ईरान-इराक युद्ध में हिस्सा लिया था। इस दौरान वह धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहे। साल 1992 में उन्हें IRGC की ग्राउंड फोर्सेज का कमांडर बनाया गया। इसके साथ ही IRGC की स्पेशल यूनिट सरल्लाह का भी प्रमुख बनाया गया, जिसे तेहरान की रक्षा का जिम्मा सौंपा गया था।
2005 में उन्हें IRGC के सेंट्रल फॉर स्ट्रेटेजिक स्टडीज का निदेशक बनाया गया। यही समय था जब उन्होंने मोजैक सिद्धांत पर काम करना शुरू किया। साल 2007 में वे IRGC के कमांडर-इन-चीफ बने और उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान मोजैक डिफेंस सिद्धांत को लागू करने पर काम किया।













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