डेस्क : ब्रिटिश कालीन पहाड़ी शहर शिलांग में हाल ही में आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक में नीति-निर्माता, राजनयिक और बुनियादी ढांचा विशेषज्ञ पूर्वोत्तर भारत में बढ़ती कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर चर्चा करने जुटे। यह बैठक थिंक-टैंक एशियन कॉन्फ्लुएंस द्वारा आयोजित की गई थी, जिसमें भारत के विदेश मंत्रालय, जापान सरकार और क्षेत्रीय संगठन बिम्सटेक ने सहयोग दिया। बैठक में क्षेत्र की सड़क, नदी और बंदरगाह परियोजनाओं के जरिए आर्थिक परिदृश्य और रणनीतिक महत्व को नया आकार देने की संभावनाओं पर जोर दिया गया।
बैठक में चर्चा के केंद्र में भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग, कलादान बहु-माध्यम पारगमन परियोजना और बांग्लादेश के मातरबारी गहरा समुद्री बंदरगाह का निर्माण था। विशेषज्ञों के अनुसार ये परियोजनाएं पूरा होने के बाद पूर्वोत्तर भारत को सीधे दक्षिण-पूर्व एशिया और वैश्विक बाजारों से जोड़ने वाले नए व्यापार मार्ग तैयार कर सकती हैं। जापान के विदेश मामलों के राज्य मंत्री इवाओ होरी ने कहा कि पूर्वोत्तर भारत भविष्य में इस क्षेत्र का महत्वपूर्ण “गेटवे” बन सकता है, जो नेपाल, भूटान, भारत, बांग्लादेश और दक्षिण-पूर्व एशिया को जोड़ने वाला बड़ा आर्थिक इंजन बन सकता है।
कहाँ क्या बन रहा है
जापान की ‘फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक’ पहल के तहत बंगाल की खाड़ी और पूर्वोत्तर भारत को जोड़ने वाली औद्योगिक वैल्यू चेन विकसित की जा रही है। इसका महत्वपूर्ण हिस्सा टाटा ग्रुप की असम में 27,000 करोड़ रुपये की सेमीकंडक्टर असेंबली और टेस्टिंग यूनिट है, जिसमें ऑटोमोबाइल इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल डिवाइस और एआई चिप्स का उत्पादन होगा।
गहरे समुद्र का बंदरगाह
बांग्लादेश के मातरबारी में विकसित हो रहा गहरा समुद्री बंदरगाह, जिसे जापान इंटरनेशनल कॉरपोरेशन एजेंसी (JICA) के सहयोग से बनाया जा रहा है, सालाना 1.6 से 3.8 करोड़ टन कार्गो संभालने में सक्षम होगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह बंदरगाह क्षेत्र के लिए वैश्विक बाजारों तक एक नया समुद्री द्वार साबित होगा। यह पहल बीबीआईएन (बांग्लादेश-भूटान-भारत-नेपाल) और वे ऑफ बंगाल इंडस्ट्रियल ग्रोथ हब्स जैसी क्षेत्रीय परियोजनाओं से भी जुड़ी है, जिसका उद्देश्य सीमा-पार आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करना और निर्यात बढ़ाना है।
भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग
नेपाल-भारत चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष केसी सुनील के अनुसार, नेपाल बांग्लादेश को जलविद्युत बेचने और अपने उत्पादों को वैश्विक बाजार तक पहुंचाने की योजना बना रहा है। 1,360 किलोमीटर लंबा भारत-म्यांमार-थाईलैंड राजमार्ग मोरेह (भारत) को म्यांमार के मे सोट से जोड़ेगा और आगे चलकर यह सिंगापुर से वियतनाम के हो ची मिन्ह सिटी तक फैले एशियाई सड़क नेटवर्क से जुड़ सकता है।
बांग्लादेश और म्यांमार से कनेक्टिविटी
बांग्लादेश के उच्चायुक्त रियाज हमीदुल्लाह ने कहा कि उनका देश इन परिवहन गलियारों से जुड़कर क्षेत्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करना चाहता है। कालादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट प्रोजेक्ट के तहत म्यांमार के जरिए पूर्वोत्तर भारत को समुद्री मार्ग उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। मिजोरम इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज के सदस्य सचिव रो चामलियाना के अनुसार, मिजोरम सीमा तक का बुनियादी ढांचा तैयार है और म्यांमार के सितवे बंदरगाह तक परीक्षण के तौर पर माल भेजा जा चुका है। हालांकि, म्यांमार में राजनीतिक अस्थिरता के कारण परियोजना का पूर्ण संचालन अभी लंबित है।
पूर्वोत्तर भारत के लिए ‘गेम-चेंजर’
पूर्व विदेश सचिव (पूर्व) रिवा गांगुली दास ने कहा कि सीमा-पार परियोजनाओं की सफलता अक्सर साझेदार देशों की राजनीतिक और लॉजिस्टिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है, लेकिन पूरी होने पर ये परियोजनाएं क्षेत्र के लिए “गेम-चेंजर” साबित हो सकती हैं। ये नए मार्ग सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) पर निर्भरता कम कर सकते हैं। साथ ही, ब्रह्मपुत्र नदी पर राष्ट्रीय जलमार्ग-2 के तहत पांडु और जोगीघोपा में नए कार्गो टर्मिनल और नदी जेट्टी बनाए जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ये सड़क, नदी और समुद्री परियोजनाएं समय पर पूरी हो जाती हैं, तो लंबे समय से ‘परिधि’ में माने जाने वाला पूर्वोत्तर भारत दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया को जोड़ने वाला प्रमुख आर्थिक द्वार बन सकता है।













मुख्य समाचार
देश
राज्य-शहर
विदेश
बिजनेस
मनोरंजन
जीवंत
