लाडनूं: जैन विश्व भारती, लाडनूं में आज युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने योगक्षेम वर्ष व्याख्यानमाला के अंतर्गत जीवन की अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में समता भाव बनाए रखने का अत्यंत मार्मिक पाथेय प्रदान किया। तत्पश्चात प्रश्नोत्तर का क्रम भी रहा। इस अवसर पर साध्वी कीर्ति रेखा जी साध्वी चैत्य प्रभा ने विचारों की अभिव्यक्ति दी।
मंगल देशना में आगम सूत्र का उल्लेख करते हुए आचार्य श्री ने फरमाया कि मनुष्य के जीवन में कभी अनुकूलता तो कभी प्रतिकूलता आ सकती है। पूर्व कृत कर्मों का फल हर किसी को भोगना पड़ता है, कर्म किसी को छोड़ते नहीं हैं; चाहे वह चक्रवर्ती सनत कुमार जैसा बड़ा आदमी ही क्यों न हो। गृहस्थ जीवन हो या साधु जीवन, दोनों में ही आरोह-अवरोह आते हैं, ऐसे में मन में दुख या उद्वेलन नहीं होना चाहिए। जीवन में सदा बड़ों के प्रति विनय का भाव रखना चाहिए। बीमारी या लोच जैसे कष्टों को यह सोचकर समता से सहन करना चाहिए कि इससे हमारे कर्मों की निर्जरा हो रही है।
नेतृत्व और टीम प्रबंधन का सूत्र देते हुए गुरुदेव ने आगे फरमाया कि विदाउट टीम नो स्कीम – बिना टीम के कोई योजना सफल नहीं हो सकती। एक मुखिया के पास सशक्त टीम होनी चाहिए और उसे सफलता का सारा श्रेय खुद लेने व गलती का ठीकरा टीम पर ढोलने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए। बल्कि सफलता व विफलता दोनों में टीम को अपना अंग मानकर साथ लेकर चलना चाहिए। एक दृष्टांत से समझाते हुए गुरुदेव ने बताया कि एक बार एक नगर में भयंकर बीमारी फ़ैल गई। राजा ने उपाय पूछा तो तीन भूतवादी आए। पहले ने कहा कि मेरा भूत सुंदर रूप में आएगा, पर जो उसे प्रणाम नहीं करेगा, वह उसे मार देगा। दूसरे ने कहा कि मेरा भूत विकराल रूप में आएगा, जो उसका उपहास करेगा उसे मार देगा। राजा ने दोनों को मना कर दिया। तीसरे ने कहा कि मेरा भूत सीधा-सादा है, कोई उसकी पूजा करे या उपहास उड़ाए, वह कोई प्रतिक्रिया नहीं करेगा, सिर्फ रोगाणुओं को खत्म करेगा। राजा ने उसे ही स्वीकार किया। गुरुदेव ने कहा कि हमारी साधना भी इसी प्रकार होनी चाहिए कि कोई प्रशंसा करे या अवहेलना, हमें समता भाव रखते हुए अपने प्रिय और अप्रिय को सहन करने की क्षमता को पुष्ट करना चाहिए।













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