यह फ़िल्म ब्लैक एंड वाइट है लेकिन ज़िन्दगी में ज़रूर रंग भरती है…
माणिकबाबू एक व्यक्ति जिसके पास विचार हैं जो वास्तविक जीवन पर आधारित नहीं है या जो बहुत व्यावहारिक नहीं है.. जिसके पास कोई संभावित प्रेमी या प्रेमिका नहीं है फिर भी वह प्यार को होने से रोक नहीं सकता.. रोमांस एक गुण जो आपकी भावनाओं को दृढ़ता से प्रभावित करता है या आपको प्यार के बारे में सोचने पर मजबूर करता है.. आस-पास की प्रकृति के साथ मिलकर बिगड़े जीवन को एक उदासीन खुशी में मिला दो तो समझना ज्यादा आसान होगा…
माणिकबाबू का चरित्र बहुत आम है… रोज़ ऑफिस की बेवजह की बातें, मकान मालिक का रोज का विवाद, लेकिन इन सबके बीच जैसे कि एक आदमी के पास एक करुणा होती है, सुबह-सुबह उठकर छत के पौधों में पानी डालना, रास्ते में मृत पड़े पेड़ में रोज़ थोड़ा सा पानी डालकर वहीं खड़े होकर उस कमजोर पेड़ के लिए थोड़ी सी जिंदगी की भीख मांगना… रसोई की चीनी के डिब्बे से कुछ चीनी फैला कर रखना, ताकि चींटियां इसे खा सकें… शायद सारा दिन खाया कि नहीं खाया यह सोच कर रोज़ रात को सड़क के कुत्तों के लिए रोटियां खरीदना… बीमार पिता के शरीर को, उनके धुंधले चश्मे के पीछे अधिक भ्रम की दृष्टि में थोड़ा अधिक सावधान करना… माणिकबाबू अपनी जिंदगी में अकेले हैं और गहरी थकान में रोज़ सो जाते हैं… माणिक बाबू का लगभग खामोश ब्लैक एंड वाइट घर इन कार्यों के साथ है… ना किसी ने उसे प्यार दिया, ना संभोग, ना दया, सिर्फ ट्यूशन के छात्र की माँ जो उसे सप्ताह में दो पांतुया (मिठाई) देती हैं, तो मानिकबाबू उसे बहुत आराम से खाते हैं… दिन बीतते हैं तपती नगरी में, बोरियत, कैलेंडर बदलते हैं घर का, माणिकबाबू के परिवार में रोज रात बूढ़े पिता के टूटे टेपरिकाॅर्डर में गीत बजते हैं… और फिर एक दिन … उसके पिता के मरने के बाद उसकी छत पर थोड़ा सा बादल आता है…
वो बादल है या वो लड़की, या माणिकबाबू के सिंगल लाइफ की कल्पना माणिकबाबू जहाँ भी जाते हैं, धूप के बीच शांति और आश्रय के बादल उनके सर में छाया देते हैं… वो बादल, जो इस जले शहर में दूसरा कोई नहीं देख पा रहा है, जिसका कोई नहीं होता शायद उसका थोड़ा सा बादल भी होता है… हम अकेले इतने लाजवाब भी हो सकते हैं पहले समझ में नहीं आया..
ये फ़िल्म ज़िन्दगी की व्यस्तताओं में फिर से परिवेश देखने के लिए मज़बूर करती है… वो मंज़र जो हमने रोज नहीं देखा, वो आवाज़ जो हमने रोज नहीं सुनी, वो सुन सकते हैं… बिना संवाद के इस चित्र संसाधन का असंभव सुंदर साउंडस्केप, कैमरे की स्थिर गति ने आवाज और शब्दों के कैनवास पर फूल खिला दिए… अभिनंदन का निर्देशन और चंदन सेन ने शायद एक अभिनेता के रूप में चुपचाप अपना सर्वश्रेष्ठ काम किया होगा माणिकबाबू की तरह… लिखने को और भी बहुत कुछ है लेकिन हर भाव को हमेशा शब्दों की कमी पड़ ही जाती है…
नोट – मेरा फ़िल्म देखना एक स्टडी की तरह है.. देख कर कुछ भी लिखने से हमेशा बचती ही हूँ लेकिन सोचा इस बार इस बांग्ला फ़िल्म के लिए कुछ लिखूं… हिन्दी या इंग्लिश मूवीज के बारे में तो सभी लिखते ही रहते है…
लिली कर्मकार।।













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