सनातन परंपरा की यह विशेषता है कि वर्ष का कोई भी मास ऐसा नहीं होता जिसमें कोई तिथि, व्रत या पर्व हमारे जीवन को आध्यात्मिक स्पर्श न देता हो। यही सतत साधना और उत्सवधर्मिता हिंदू पंचांग की आत्मा है। इन्हीं पावन तिथियों में एक है प्रदोष व्रत, जो भगवान शिव की उपासना के लिए अत्यंत शुभ माना गया है।
प्रत्येक मास में दो बार—कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को—प्रदोष व्रत रखा जाता है। “प्रदोष” का अर्थ है संध्या का वह पावन काल, जब दिन और रात्रि का संगम होता है। यह समय शिव-आराधना के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है। मान्यता है कि इस व्रत को विधि-विधान से करने पर महादेव अपने भक्तों पर विशेष कृपा बरसाते हैं।
फाल्गुन मास का अंतिम प्रदोष व्रत आज रविवार, 1 मार्च को पड़ रहा है। रविवार को पड़ने के कारण इसे “रवि प्रदोष व्रत” कहा जाता है। दिन के अनुसार प्रदोष व्रत का नामकरण होना इसकी विशेष परंपरा है। रवि प्रदोष का संबंध सूर्यदेव से भी जुड़ जाता है, जिससे इसका आध्यात्मिक प्रभाव और व्यापक हो जाता है।
तिथि और पूजा मुहूर्त
त्रयोदशी तिथि का प्रारंभ 28 फरवरी को रात्रि 8 बजकर 43 मिनट से हुआ है और यह 1 मार्च को रात्रि 9 बजकर 11 मिनट तक रहेगी। उदयातिथि के आधार पर आज प्रदोष व्रत रखा जा रहा है।
संध्याकालीन पूजा का शुभ मुहूर्त सायं 6 बजकर 21 मिनट से 7 बजकर 8 मिनट तक रहेगा। इस अवधि में शिव-पार्वती की आराधना विशेष फलदायी मानी गई है।
रवि प्रदोष पर सूर्योपासना का महत्व
रविवार सूर्यदेव को समर्पित है। अतः रवि प्रदोष के दिन भगवान शिव की पूजा के साथ-साथ सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित करना अत्यंत शुभ माना गया है। प्रातःकाल स्वच्छ जल में लाल पुष्प या अक्षत डालकर सूर्य को अर्घ्य देने से आत्मबल, तेज और नेतृत्व क्षमता में वृद्धि होती है। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार यह उपाय करियर और व्यवसाय में आ रही बाधाओं को दूर करने में सहायक होता है तथा उन्नति के मार्ग प्रशस्त करता है।
पार्वती चालीसा पाठ का विशेष फल
प्रदोष व्रत केवल शिव उपासना तक सीमित नहीं है। यदि इस दिन माता पार्वती की आराधना भी की जाए तो साधना पूर्ण मानी जाती है। विशेषतः विवाह में विलंब या दांपत्य जीवन में उत्पन्न बाधाओं के निवारण हेतु पार्वती चालीसा का श्रद्धापूर्वक पाठ अत्यंत प्रभावी माना गया है।
माता पार्वती सौभाग्य, समर्पण और अटूट प्रेम की प्रतीक हैं। उनके चालीसा-पाठ से वैवाहिक जीवन में मधुरता, पारिवारिक समन्वय और मानसिक शांति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। शिव और शक्ति की संयुक्त आराधना से जीवन में संतुलन, स्थिरता और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
प्रदोष व्रत की संक्षिप्त पूजा-विधि
प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें। दिन भर संयम और सात्त्विकता बनाए रखें। संध्या समय पुनः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। शिवलिंग का गंगाजल, दूध और शुद्ध जल से अभिषेक करें। बिल्वपत्र, धतूरा, अक्षत और पुष्प अर्पित करें। “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप करें तथा पार्वती चालीसा या शिव स्तुति का पाठ करें। अंत में आरती कर प्रसाद वितरण करें।
आध्यात्मिक संदेश
फाल्गुन का यह अंतिम रवि प्रदोष केवल एक तिथि नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और साधना का अवसर है। जब संध्या का गहन नीरव क्षण आता है, तब बाह्य कोलाहल से हटकर मन को शिव के चरणों में समर्पित करना ही इस व्रत का सार है।
शिव का अर्थ है कल्याण, और पार्वती शक्ति का प्रतीक हैं। जब जीवन में शिव का कल्याण और शक्ति का संतुलन स्थापित हो जाता है, तब साधक के लिए कोई भी बाधा स्थायी नहीं रह जाती।
इस पावन अवसर पर श्रद्धा, विश्वास और विधि के साथ की गई उपासना निश्चय ही मंगलमय फल प्रदान करे—इसी कामना के साथ।













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