लाडनूं : जैन विश्व भारती, लाडनूं में विराजित युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन सान्निध्य में ज्ञान और अध्यात्म का अद्भुत प्रवाह अनवरत जारी है। आज के मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में आचार्य श्री ने ‘संभाषण की कला’ के अत्यंत महत्वपूर्ण विषय पर अपना पावन पाथेय प्रदान किया। गुरुदेव ने आगम की वाणियों और दैनिक व्यवहार के उदाहरणों के माध्यम से वाणी के संयम, निरर्थक व मर्मभेदी भाषा से बचने और व्यवहार में शिष्टता बनाए रखने का मार्गदर्शन दिया।
उत्तराध्ययन आगम का सूत्र उद्घृत करते हुए आचार्यश्री ने फरमाया कि सावद्य (पापकारी), निरर्थक और मर्मभेदी भाषा नहीं बोलनी चाहिए। दिन भर में हम कितने शब्द काम में लेते हैं, यदि गहराई से ध्यान दें तो पाएंगे कि हम आवश्यक कितना बोले और अनावश्यक कितना। बोलना कोई बड़ी बात नहीं है और नहीं बोलना भी कोई बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात है बोलने और न बोलने का विवेक रखना। जैसे खाना या न खाना बड़ी बात नहीं, बल्कि खाने और न खाने का विवेक महत्वपूर्ण है। बल, आरोग्य, काल और क्षेत्र को देखकर आदमी यह विवेक कर ले कि यह काम करणीय है या नहीं। यदि स्वयं में इतना विवेक न हो, तो गुरु या विशेषज्ञ परामर्शक से मार्गदर्शन लेना चाहिए। तीर्थंकर भगवान घाती कर्मों के क्षय के बाद भी देशना देते हैं, वे मौन लेकर नहीं बैठ जाते, क्योंकि उनका बोलना जीवों के उद्धार और अनुकंपा के लिए होता है। बोलना भी परोपकार का काम होता है, बस हमारा विवेक ठीक रहे कि कहाँ बोलना है और कहाँ मौन रखना है।
वाणी संयम पर जोर देते हुए गुरुदेव ने फरमाया कि अर्थहीन और मर्मभेदी भाषा से हमेशा बचना चाहिए। मर्मभेदी भाषा वह है जिससे कोई व्यक्ति इतना लज्जित या निराश हो जाए कि वह मृत्यु की इच्छा करने लग जाए। किसी की कोई पुरानी या गोपनीय बात कई लोगों के सामने बोलकर उसे शर्मिंदा करना चुभने वाली बात होती है। वाणी में अमृत भी हो सकता है और वाणी में विष भी हो सकता है। अर्थ या धन का दान देने से बड़ा दान सम्मान देना है। इसलिए हमारी भाषा ऐसी शिष्ट और प्रामाणिक होनी चाहिए जिससे दूसरों का अकारण अपमान न हो। न अपने लिए, न दूसरों के लिए और न ही बिना किसी प्रयोजन के हमें सावद्य, निरर्थक या मर्मभेदी भाषा का प्रयोग करना चाहिए।
मुख्य प्रवचन और प्रश्नोत्तर सत्र के पश्चात्, जैन विश्व भारती द्वारा मानवीय मूल्यों और साहित्य को समर्पित आचार्य महाप्रज्ञ साहित्य पुरस्कार (2024) समारोह का भव्य आयोजन किया गया। जैन विश्व भारती के महामंत्री श्री सलिल जी लोढ़ा ने संस्थान के गौरवशाली इतिहास एवं पुरस्कार के संदर्भ में जानकारी दी। सूरजमल सुराणा चैरिटेबल ट्रस्ट (गुवाहाटी) के सौजन्य से ‘आचार्य महाप्रज्ञ साहित्य पुरस्कार’ इस वर्ष साहित्यकार और कवि श्री राजेश जी चेतन को उनकी उत्कृष्ट साहित्य और राष्ट्र सेवा के लिए प्रदान किया गया। प्रधान न्यासी जयंती लाल जी सुराणा, जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय के कुलपति श्री बछराज दुगड़ सहित अन्य गणमान्य पदाधिकारियों ने श्री राजेश चेतन का सम्मान किया। श्री राजेश चेतन ने पुरस्कार प्राप्त कर आचार्य प्रवर के प्रति कृतज्ञ विचारों की अभिव्यक्ति दी।













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