जिस युग में न्याय शब्द अक्सर अदालतों, तर्कों और तकनीकी परिभाषाओं तक सिमट कर रह गया हो, वहाँ सनातन चेतना हमें एक ऐसे न्याय की स्मृति कराती है जो न तो बहस करता है, न प्रचार चाहता है, न ही पक्षपात स्वीकार करता है। यह न्याय है — शनि देव का न्याय। शनि देव को सामान्यतः भय, विलंब और दंड से जोड़ दिया गया है, किंतु सनातन परंपरा में वे भय के देव नहीं, बल्कि कर्म के निष्पक्ष निर्णायक हैं।
शनि देव का स्वरूप मौन है। वे शीघ्र प्रसन्न नहीं होते, पर शीघ्र क्रोधित भी नहीं होते। यही उनका धर्म है। जिस समाज में त्वरित परिणामों की माँग बढ़ गई हो, वहाँ शनि देव हमें स्मरण कराते हैं कि न्याय का स्वभाव धीमा होता है, पर स्थायी होता है। वे किसी की पदवी, वाणी या प्रभाव से प्रभावित नहीं होते। उनके लिए मनुष्य केवल अपने कर्मों का प्रतिनिधि होता है।
आज का युग अन्याय का युग इसलिए नहीं कहा जा सकता कि यहाँ अपराध अधिक हैं, बल्कि इसलिए कि अपराध के साथ समझौते बढ़ गए हैं। शनि देव इसी समझौते को स्वीकार नहीं करते। वे न तो निर्दोष को दंड देते हैं और न दोषी को छोड़ते हैं। उनका विधान समय लेता है, पर चूकता नहीं। यही कारण है कि शनि देव को ‘काल’ से जोड़ा गया है — क्योंकि समय ही उनका माध्यम है।
सनातन दृष्टि में शनि देव दंडदाता नहीं, संस्कारदाता हैं। वे मनुष्य के भीतर छिपे अहंकार, छल और अधर्म को धीरे-धीरे उजागर करते हैं। जब जीवन में बाधाएँ आती हैं, जब श्रम का फल तुरंत नहीं मिलता, जब अकेलापन घेरता है — तब वास्तव में शनि देव मनुष्य को भीतर से गढ़ रहे होते हैं। यह प्रक्रिया कष्टदायक हो सकती है, पर यही प्रक्रिया चरित्र को जन्म देती है।
शनि देव की सबसे बड़ी शिक्षा है — जवाबदेही। वे यह नहीं पूछते कि आपने क्या कहा, वे यह देखते हैं कि आपने क्या किया। वे यह नहीं देखते कि आपने किसके पक्ष में आवाज़ उठाई, वे यह देखते हैं कि आपने सत्य के पक्ष में कितना खड़ा होना स्वीकार किया। इसीलिए शनि देव का न्याय मौन होता है, पर अटल होता है।
आज जब व्यवस्था अक्सर कमजोर दिखती है, जब न्याय की परिभाषा सुविधाओं से तय होने लगती है, तब शनि देव सनातन चेतना में एक अंतिम स्तंभ की तरह खड़े दिखाई देते हैं। वे स्मरण कराते हैं कि कोई भी कर्म व्यर्थ नहीं जाता, कोई भी अन्याय अनदेखा नहीं होता, और कोई भी सत्य अंततः पराजित नहीं होता।
शनि देव का भय नहीं, उनका बोध आवश्यक है। जो उन्हें समझ लेता है, वह जीवन की कठिनाइयों से भागता नहीं, बल्कि उन्हें साधना बना लेता है। ऐसे ही मनुष्यों के लिए शनि देव दंड नहीं, दीक्षा होते हैं।
अन्याय के इस युग में, जब न्याय अक्सर शोर में खो जाता है, शनि देव हमें एक मौन विश्वास देते हैं —
कि समय के अंत में, नहीं, बल्कि समय के माध्यम से, न्याय अवश्य होता है।












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