लाडनूं : जन-जन के मानस को आध्यात्मिकता का अभिसिंचन प्रदान करने वाले, लोगों को सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति का संदेश देने वाले, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी वर्तमान समय में तेरापंथ की राजधानी के रूप में सुविख्यात लाडनूं नगर में स्थित जैन विश्व भारती के सुरम्य परिसर में योगक्षेम वर्ष का मंगल प्रवास कर रहे हैं। इतना लम्बा प्रवास प्राप्त कर लाडनूंवासी अत्यंत आह्लादित हैं। इस सुअवसर का लाभ उठाने के लिए देश-विदेश में रहने वाले श्रद्धालु भी वर्तमान समय में अपने नगर में पहुंचकर इस सौभाग्य का लाभ प्राप्त कर रहे हैं।
बुधवार को प्रातःकालीन मंगल प्रवचन कार्यक्रम के लिए महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी सुधर्मा सभा में पधारे। आचार्यश्री के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। साध्वीवृंद ने प्रज्ञागीत को प्रस्तुति दी। तदुपरान्त शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने चतुर्विध धर्मसंघ को कुछ समय तक ध्यान का प्रयोग कराया।
महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘स्वच्छन्दता का निरोध करें’ को विवेचित करते हुए कहा कि अनुशासनबद्धता और अनुशासनहीनता, स्वच्छन्दता और नियंत्रित रहना- ये दो स्थितियां होती हैं। आदमी यह सोचता है कि मैं दूसरों की अनुशासन में क्यों रहूं। स्वानुशासी बन जाना, कषाय बहुत मंद हो जाएं, ऐसी तो बहुत उच्च स्थिति होती है। वहां तो भला दूसरों की शासन की अपेक्षा न होती हो, किन्तु सामुदायिक में अनुशासन की अपेक्षा होती है। आदमी अपनी इन्द्रियों को स्वस्थ बनाए रखने के लिए कितना-कितना उपाय करता है। आंखों की टेस्टिंग, कानों की टेस्टिंग अथवा सफाई अथवा कोई योग आदि करते हैं। सुनने के लिए कान में मशीन भी लगाई जाती है। आदमी के इन्द्रियों में दुर्बलता भी आ सकती है। सामान्य आदमी अपनी इन्द्रियों की दुर्बलता को दूर करने का प्रयास भी करता है।
आगम में बताया गया है कि स्वच्छन्दता का निरोध करने वाला साधु संसार का पार पा सकता है। और स्वच्छन्दता का निरोध न हो तो आदमी भवसागर में फंसा हुआ रह सकता है। इसलिए आदमी को स्वच्छन्दता को छोड़ने और अनुशासन में रहने का प्रयास करना चाहिए। बड़ों के साए में, अनुशासन में रहने से ही कल्याण संभव हो सकता है। अनुशासनहीनता, उद्दण्डता से बचने का प्रयास करना चाहिए। जो आदमी अथवा साधु अनुशासन में रहता है, शिक्षित होता है, अच्छे ढंग से ज्ञान का अर्जन करता है, उसे सफलता की प्राप्ति हो सकती है और जो अनुशासनहीन हो जाए, स्वच्छन्दता में चला जाता है, उसे विफलता प्राप्त हो सकती है। आदमी को अपने जीवन के पहले हिस्से भी प्रमादों से बचते हुए अनुशासन में रहने का प्रयास करना चाहिए। बड़ों के साथ अनुशासित रखना, बड़ों के प्रति उचित विनय का भाव रखने वाले मुनि का सर्वांगीण विकास हो सकता है। इसलिए आदमी को विनयवान रहते हुए अपने जीवन में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त चारित्रात्माओं ने अपनी जिज्ञासाओं को प्रस्तुत किया, जिसको आचार्यश्री ने समाहित किया। आचार्यश्री से अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त कर चारित्रात्मा असीम शांति का अनुभव कर रहे थे।













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