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2035 तक एशिया के तीन संभावित परिदृश्य, भारत की भूमिका अहम : तुर्की राजनयिक

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2035 तक एशिया के तीन संभावित परिदृश्य, भारत की भूमिका अहम : तुर्की राजनयिक

ON THE DOT TEAM by ON THE DOT TEAM
March 13, 2026
in मुख्य समाचार
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2035 तक एशिया के तीन संभावित परिदृश्य, भारत की भूमिका अहम : तुर्की राजनयिक

नई दिल्ली : तुर्की के वरिष्ठ राजनयिक अहमेत उनाल चेविकोज ने कहा है कि एशिया की भविष्य की स्थिरता काफी हद तक प्रभावी कूटनीति पर निर्भर करेगी। उन्होंने चेतावनी दी कि क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों को अपनी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को संघर्ष में बदलने से रोकना होगा।

राजधानी दिल्ली में आयोजित सिनर्जीया कॉन्क्लेव के दसवें संस्करण को संबोधित करते हुए चेविकोज ने कहा कि वर्तमान समय में एशिया न केवल वैश्विक आर्थिक विकास का इंजन बन चुका है, बल्कि यह तेजी से बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों का केंद्र भी बन गया है। उन्होंने यह भी कहा कि एशिया में स्थिरता और संतुलन की शक्ति के रूप में भारत का महत्व लगातार बढ़ रहा है।

चेविकोज ने कहा, “आज एशिया वैश्विक विकास का इंजन भी है और भू-राजनीतिक बदलावों का केंद्र भी। दुनिया के किसी अन्य क्षेत्र में आर्थिक गतिशीलता, तकनीकी नवाचार, विशाल जनसंख्या और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का इतना बड़ा संगम देखने को नहीं मिलता।”

हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यह स्थिति अवसरों के साथ-साथ जोखिम भी पैदा करती है। उनके अनुसार नीति-निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कूटनीति के माध्यम से बढ़ती प्रतिस्पर्धा को नियंत्रित रखा जाए।

उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या कूटनीति यह सुनिश्चित कर सकती है कि यह प्रतिस्पर्धा नियंत्रण में रहे और संघर्ष का रूप न ले।

एशियाई स्थिरता के तीन पारंपरिक स्तंभ

चेविकोज ने बताया कि एशिया में क्षेत्रीय स्थिरता ऐतिहासिक रूप से तीन प्रमुख स्तंभों पर आधारित रही है—

  • संयुक्त राज्य अमेरिका की रणनीतिक उपस्थिति
  • चीन का वैश्विक बाजारों से जुड़ाव और उससे बनी आर्थिक परस्पर निर्भरता
  • आसियान के नेतृत्व में बहुपक्षीय कूटनीति

हालांकि उन्होंने चेतावनी दी कि बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण ये तीनों स्तंभ अब दबाव में दिखाई दे रहे हैं।

नए गठबंधन और बदलता भू-राजनीतिक ढांचा

चेविकोज के अनुसार आज आर्थिक परस्पर निर्भरता भी तकनीकी प्रतिस्पर्धा, आपूर्ति श्रृंखला के विविधीकरण और आर्थिक सुरक्षा की चिंताओं से प्रभावित हो रही है। पारंपरिक संस्थाएं भी अधिक विभाजित होते वैश्विक माहौल के साथ तालमेल बिठाने में संघर्ष कर रही हैं।

उन्होंने कहा कि इसी वजह से क्षेत्र में सहयोग के नए रूप सामने आ रहे हैं, जैसे रणनीतिक साझेदारियाँ और मुद्दा-आधारित गठबंधन। उदाहरण के तौर पर क्वाड और ऑकस जैसे समूह उभरकर सामने आए हैं।

2035 तक एशिया के तीन संभावित परिदृश्य

चेविकोज ने वर्ष 2035 तक एशिया के भविष्य के तीन संभावित परिदृश्यों का भी उल्लेख किया—

  1. प्रतिस्पर्धात्मक स्थिरता – इसमें अमेरिका और चीन जैसी बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा जारी रहेगी, लेकिन वह नियंत्रित और पूर्वानुमानित सीमाओं में रहेगी।
  2. रणनीतिक विखंडन – इसमें तकनीक, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के आधार पर अलग-अलग प्रतिस्पर्धी समूह बन सकते हैं, जिससे क्षेत्र में लगातार अस्थिरता बनी रह सकती है।
  3. सहयोगात्मक बहुध्रुवीयता – यह सबसे आशावादी स्थिति होगी, जिसमें क्षेत्रीय शक्तियां कठोर सैन्य गठबंधनों के बजाय लचीले सहयोग नेटवर्क विकसित करेंगी।

मध्यम शक्तियों की बढ़ती भूमिका

तुर्की के राजनयिक ने कहा कि आज की बहुध्रुवीय व्यवस्था में मध्यम शक्तियां केवल दर्शक नहीं रहीं, बल्कि स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। उन्होंने विशेष रूप से भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया का उल्लेख किया।

चेविकोज ने कहा कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की नीति उसे एक साथ कई देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की अनुमति देती है, जिससे उसकी कूटनीतिक भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है।

उन्होंने प्राचीन भारतीय रणनीतिकार कौटिल्य और उनके ग्रंथ अर्थशास्त्र का भी उल्लेख करते हुए कहा कि “मंडल सिद्धांत” बताता है कि स्थिरता कठोर गठबंधनों से नहीं बल्कि संतुलित संबंधों के विवेकपूर्ण प्रबंधन से उत्पन्न होती है।

अंत में उन्होंने कहा कि एशिया का भविष्य केवल शक्ति संतुलन पर निर्भर नहीं करेगा, बल्कि कूटनीति की गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी। उनके अनुसार यदि कूटनीति सक्रिय, रचनात्मक और समावेशी बनी रहती है, तो एशिया आने वाले समय में भी वैश्विक अर्थव्यवस्था का सबसे गतिशील क्षेत्र बना रह सकता है।

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