डेस्क : अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में हालिया गिरावट के बावजूद देश की तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) पर वित्तीय दबाव बना हुआ है। एक ओर केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) में 10-10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की थी, वहीं दूसरी ओर ईंधन की खुदरा कीमतों में 7.50-7.50 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी भी की गई। इसके बावजूद कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बरकरार रहने की आशंका जताई जा रही है।
ब्रोकरेज रिपोर्टों के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से गिरकर करीब 81 डॉलर प्रति बैरल तक आ गई हैं, लेकिन पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर तेल कंपनियों को अब भी अंडर-रिकवरी का सामना करना पड़ सकता है। अनुमान है कि पेट्रोल पर लगभग 7 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 10 रुपये प्रति लीटर तक का दबाव बना रह सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार द्वारा की गई कर कटौती का बड़ा हिस्सा तेल कंपनियों को राहत देने के लिए इस्तेमाल हुआ, ताकि बढ़ती अंतरराष्ट्रीय कीमतों के दौर में उनके घाटे को कम किया जा सके। यही वजह है कि करों में कमी का पूरा लाभ उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंच पाया।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यदि सरकार भविष्य में पहले दी गई एक्साइज ड्यूटी राहत को चरणबद्ध तरीके से वापस लेती है, तो तेल कंपनियों की लाभप्रदता पर अतिरिक्त असर पड़ सकता है। सरकार को इस कर कटौती के कारण बड़े राजस्व नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।
हालांकि, अमेरिका-ईरान तनाव में नरमी और होर्मुज जलडमरूमध्य में स्थिति सामान्य होने की उम्मीद से कच्चे तेल की कीमतों में कुछ राहत मिली है। इसके बावजूद वैश्विक मांग, रणनीतिक तेल भंडारों की पुनः पूर्ति और भू-राजनीतिक परिस्थितियां भविष्य में कीमतों को फिर ऊपर ले जा सकती हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों का रुख काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के भाव, सरकारी कर नीति और तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर निर्भर करेगा।













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