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Home राजनीतिक

जम्मू-कश्मीर में फिर क्यों राम माधव की वापसी, भाजपा को कैसे दिला सकते हैं फायदा

ON THE DOT TEAM by ON THE DOT TEAM
August 22, 2024
in राजनीतिक
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जम्मू-कश्मीर में फिर क्यों राम माधव की वापसी, भाजपा को कैसे दिला सकते हैं फायदा

जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। भारतीय जनता पार्टी के नेता राम माधव को चुनाव प्रभारी बनाया है। इस घोषणा के ठीक 24 घंटे के भीतर उन्होंने पार्टी के चुनावी अभियान को दिशा देने के लिए स्थानीय नेताओं के साथ कई बैठकें कीं। कई स्थानीय नेताओं के मुताबिक, चुनाव प्रभारी के रूप में उनकी वापसी से पार्टी की स्थानीय इकाई उत्साहित है। 2014 में उनके साथ मिलकर काम किया था। राम माधव के साथ केंद्रीय मंत्री जी किशन रेड्डी को भी इसकी जिम्मेदारी मिली है।

2014 को चुनाव में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के एक जाने-माने चेहरे राम माधव को कश्मीर में पार्टी की राजनीतिक और चुनावी कहानी का मसौदा तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी। उन्हें ही दो अलग-अलग विचारधारा वाली पार्टियों भाजपा और क्षेत्रीय क्षत्रप पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के साथ आने का श्रेय दिया जाता है।

नाम न छापने की शर्त पर पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने बताया, “घाटी में भाजपा के लिए जमीनी स्तर पर बहुत कम समर्थन था। ऐसा इसलिए क्योंकि भाजपा का अनुच्छेद 370 को खत्म करने और 35 (ए) को हटाने का एजेंडा अच्छी तरह से लोगों के बीच में गूंजता था। राम माधव ने क्षेत्रीय नेताओं और पार्टियों के साथ मिलकर लोगों और पार्टी के बीच एक पुल बनाने के लिए पर्दे के पीछे काम किया। वह काफी हद तक सफल रहे। भाजपा ने कश्मीर संभाग में कोई सीट नहीं जीती, लेकिन जम्मू क्षेत्र में 25 सीटें हासिल कीं। इसके साथ ही भगवा पार्टी सत्ता के बंटवारे के लिए बातचीत करने की स्थिति में आ गई।”

आपको बता दें कि 2014 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 25, पीडीपी ने 28, कांग्रेस ने 12 और नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 15 सीटें जीती थीं।

महबूबा ने खींच लिए थे हाथ
पीडीपी के साथ भाजपा का गठबंधन अल्पकालिक था। तत्कालीन मुख्यमंत्री और पीडीपी के संरक्षक मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के तुरंत बाद गठबंधन में संकट सामने आया। उनकी बेटी और राजनीतिक उत्तराधिकारी महबूबा मुफ्ती ने गठबंधन जारी रखने के मुद्दे पर अपने पैर पीछे खींच लिए। इसके बाद राम माधव को सितंबर 2020 में राष्ट्रीय महासचिव के पद से हटा दिया गया और वे अपने मूल संगठन आरएसएस में वापस चले गए।

गठबंधन बनाने में काम आएगी राम माधव की केमेस्ट्री
भाजपा नेता ने कहा, “उनकी वापसी संकेत देती है कि भाजपा गठबंधन बनाने और कहानी को धार देने की उनकी क्षमता पर भरोसा कर रही है। पार्टी उनकी अभिव्यक्ति और मीडिया एक्सपोजर का लाभ उठाकर पार्टी के लिए स्थिति बेहतर बनाना चाहती है। विपक्ष के इस आरोप का भी मुकाबला करना चाहती है जिसमें कहा जाता है कि केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 को हटाने और राज्य को विभाजित करने के लिए कानूनों का उल्लंघन किया है।”

वहीं, एक दूसरे नेता ने कहा कि राम माधव की वापसी को स्थानीय नेतृत्व को बढ़ावा देने, क्षत्रपों, पीडीपी और एनसी से जुड़े नेताओं के साथ संवाद का एक चैनल खोलने के भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के प्रयासों के रूप में देखा जा रहा है।

आपको बता दें कि जम्मू-कश्मीर में आज के समय में सज्जाद लोन के नेतृत्व वाली पीपुल्स कॉन्फ्रेंस, अल्ताफ बुखारी के नेतृत्व वाली अपनी पार्टी और पूर्व कांग्रेसी गुलाम नबी आजाद की डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आजाद पार्टी जैसे कई राजनीतिक संगठन हैं जो एनसी और पीडीपी के विकल्प के रूप में सामने आ रहे हैं।

सुधारेंगे भाजपी के लिए नैरेटिव
नाम न बताने की शर्त पर दूसरे नेता ने कहा, “जम्मू-कश्मीर के राज्य का दर्जा खोने और यूटी बनने के बाद ऐसी धारणा थी कि भाजपा अब जम्मू तक ही सीमित रहेगी और घाटी में उसका समर्थन पूरी तरह खत्म हो जाएगा। उनका काम यह सुनिश्चित करना होगा कि भाजपा जम्मू की 43 सीटों में से अधिकांश पर जीत हासिल करे। साथ ही घाटी में भी अपना खाता खोले। खासकर उन निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा की नजरें हैं जो कि गूजर और पहाड़ी बहुल हैं। इन्हें अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद आरक्षण का लाभ मिला है।”

आपको बताते चलें कि 2022 के परिसीमन के बाद जम्मू क्षेत्र में 43 सीटें हैं जो भाजपा का गढ़ है और मुस्लिम बहुल कश्मीर संभाग में 47 सीटें हैं। 21 सीटें पाकिस्तान अधिकृत जम्मू और कश्मीर के लिए आरक्षित हैं। जबकि अनुसूचित जाति (एससी) के लिए 7 सीटें हैं। पहली बार यूटी में अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए 9 सीटें आरक्षित की गई हैं।

अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद घाटी में भाजपा के लिए यह पहली चुनावी परीक्षा होगी। एक नेता ने कहा, “राम माधव का पार्टी लाइन से परे राजनीतिक नेताओं के साथ व्यवहार में सहजता और एक उदारवादी के रूप में उनकी छवि चुनाव के बाद की स्थिति में बातचीत के लिए एक महत्वपूर्ण विशेषता होगी। अगर किसी भी पार्टी को स्पष्ट जनादेश नहीं मिलती है तो राम माधव बातचीत का चैनल खोलने में मददगार साबित होंगे।”

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