कोबा, गांधीनगर:वर्ष 2025 का चतुर्मास अब धीरे-धीरे सम्पन्नता की ओर है। अहमदाबाद के इस चतुर्मास के उपरान्त जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना से के साथ पुनः गतिमान होंगे। आचार्यश्री गुजरात व राजस्थान के कुछ हिस्सों का स्पर्श करते हुए फरवरी माह में ही राजस्थान के लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती में योगक्षेम वर्ष के लिए महामंगल प्रवेश करेंगे। योगक्षेम वर्ष के दौरान आचार्यश्री का लाडनूं स्थित जैन विश्व भारती में लगभग तेरह महीने का प्रलम्ब प्रवास निर्धारित है। इसे लेकर लाडनूंवासी श्रद्धालुओं में नहीं, जैन विश्व भारती व देश-विदेश में प्रवासित श्रद्धालुओं का उत्साह अपने चरम पर सभी अपने आराध्य के इस लम्बे प्रवास के संदर्भ में अपनी-अपनी तैयारियों में संलग्न हैं। हालांकि आचार्यश्री अभी 5 नवम्बर तक कोबा स्थित प्रेक्षा विश्व भारती मंे विराजमान रहेंगे।
रविवार को ‘वीर भिक्षु समवसरण’ में उपस्थित श्रद्धालुओं को महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आयारो आगम के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि मनुष्य कामों में आसक्त रहते हैं। आदमी को पदार्थों की, भौतिक चीजों में, रस आदि के प्रति आसक्त हो जाता है। शब्द, रूप, रस, गंध व स्पर्श- ये पांच भौतिक चीजें हैं। काम-भोग वाले हैं, आदमी इनमें आसक्त होता है और वह आसक्ति दुःख का कारण बन जाती है। वह दुःख भले मानसिक रूप में हो अथवा शारीरिक रूप में हो। शारीरिक कष्टों का कारण और मानसिक कष्टों का हेतु भी आसक्ति बन सकती है।
आदमी भोजन करता है। चिकित्सक के द्वारा मिठाई, तला हुआ भोजन आदि निषिद्ध होते हैं, फिर भी उनमें आदमी को स्वाद आता है, उसके प्रति आसक्ति होती है तो आदमी उन चीजों को खाता और पीता है। अब इसके खाने से किसी के शरीर में गड़बड़ हो जाए तो वह आसक्ति उस गड़बड़ का उपादान बन सकती है। काम और पदार्थों के प्रति आसक्ति दुःख का कारण है। कायिक व मानसिक दुःखों का कारण आसक्ति होती है। आदमी को अपने जीवन में आसक्ति को कम करने का अथवा छोड़ने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को अनासक्त भाव में रहना चाहिए। कर्त्तव्य मानकर निर्वाह करना चाहिए, किन्तु अनासक्ति के भाव भी विकास करते रहना चाहिए। पदार्थों में आसक्ति करनी ही नहीं चाहिए। पदार्थों का आवश्यकतानुसार उपयोग तो किया जा सकता है, किन्तु उसमें आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। भूख लगी है तो भोजन करना है, प्यास लगी है तो पानी शिकंजी आदि पीना है। सर्दी है तो गर्म कपड़े पहनना है, किन्तु उसमें आसक्ति क्यों रखनी चाहिए। जितनी आवश्यकता है, उसके अनुसार उपयोग करना चाहिए।
आदमी के भीतर दया और अनुकंपा की भावना भी होती है। आदमी को काम, भोग, पदार्थों आदि में आसक्ति होती है तो आदमी कई जन्मों तक भव-भव में भटक सकता है। वर्तमान में आदमी भाग्यशाली है कि उसे मानव जीवन प्राप्त है। आदमी को इस मानव जीवन का लाभ उठाने का प्रयास करना चाहिए। जहां तक संभव हो आसक्ति से मुक्त रहते हुए धर्म, ध्यान, सेवा आदि के माध्यम से मानव जीवन का अच्छा लाभ उठाने का प्रयास करना चाहिए। साधु-साध्वियों से भी धर्माराधना में सहयोग लिया जा सकता है। आदमी को आसक्ति को छोड़ने और अनासक्ति की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री ने साध्वीवर्याजी के दीक्षा दिवस के संदर्भ में उन्हें मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। साध्वीप्रमुखाजी का कल दीक्षा दिवस है। आचार्यश्री ने साध्वीप्रमुखाजी को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। आचार्यश्री ने शासन गौरव साध्वी राजीमतीजी के दीक्षा के संयम पर्याय के 75 वर्ष पूर्ण होने वाले हैं। इस संदर्भ में आचार्यश्री उन्हें मंगल आशीष प्रदान किया। तदुपरान्त साध्वीप्रमुखाजी व साध्वीवर्याजी ने समुपस्थित जनता को उद्बोधित किया।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद के नवनिर्वाचित टीम के शपथ ग्रहण का कार्यक्रम भी आयोजित हुआ। इस संदर्भ में अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद के निवर्तमान अध्यक्ष श्री रमेश डागा ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी। नवनिर्वाचित अध्यक्ष श्री पवन माण्डोत को आचार्यश्री ने मंगलपाठ सुनाया तदुपरान्त श्री डागा ने उन्हें शपथ दिलाई। श्री माण्डोत ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी।













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