कोबा, गांधीनगर (गुजरात) : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में वर्तमान में अंतर्राष्ट्रीय प्रेक्षाध्यान शिविर आयोजित हो रहा है, जिसमें 8 देशों से करीब 32 लोग संभागी बने हुए हैं। इन शिविरों में रूस, यूक्रेन, सरबिया, स्टोनिया, श्रीलंका, नेपाल आदि देशों से संभागी प्रेक्षाध्यान के माध्यम से अपनी आत्मा को निर्मल बनाने का अभ्यास कर रहे हैं। मंगलवार को अंतर्राष्ट्रीय प्रेक्षाध्यान शिविर का मंचीय उपक्रम मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में आयोजित हुआ। जिसमें शिविरार्थियों ने अपने अनुभवों को साझा करने के साथ ही प्रेक्षाध्यान गीत का सामूहिक संगान भी किया। दूर देशों से आए लोगों की भक्ति भावना और प्रस्तुति देख श्रद्धालुगण निहाल थे।
मंगलवार को ‘वीर भिक्षु समवसरण’ में समुपस्थित जनता व अंतर्राष्ट्रीय प्रेक्षाध्यान शिविर के शिविरार्थियों को महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि आयारो आगम में बताया गया है कि आदमी विषयासक्त हो जाता है तो उससे शरीर भी प्रभावित हो सकता है और शरीर अबल अर्थात् शक्तिहीन भी बन सकता है। आसक्ति तीव्र है तो फिर आदमी के लिए अपने आप पर कन्ट्रोल करना भी मुश्किल हो सकता है। ऐसी स्थिति में वह नहीं खाने वाली चीज भी खा लेता है। जितना नहीं खाना चाहिए, उससे ज्यादा खा लेता है और भी अनेक विषयों का सेवन वह आसक्तिपूर्वक करता है। उसके इस आसक्ति का परिणाम शरीर के दौर्बल्य रूप में हो सकता है।
शरीर तब दुर्बल हो जाता है तो आदमी पीड़ा का अनुभव कर सकता है। जीवन में अच्छा कार्य करने के लिए अच्छे शरीर का होना भी अत्यंत आवश्यक होता है। शरीर अच्छा होता है, शरीर का बल ठीक रहता है और मनोबल मजबूत हो और मानसिक शांति की स्थिति रहे तो आदमी सूझबूझ से वह अच्छा कार्य कर सकता है। कार्य करने की दिशा कैसी है, यह भी महत्त्वपूर्ण बात होती है। साधन सामग्री तो ठीक है, शरीर बल अच्छा, मनोबल अच्छा है तो भी आदमी इन शक्तियों का उपयोग किस दिशा में करता है, वह जानने योग्य होती है। शक्ति का प्रयोग अच्छी दिशा और अच्छे कार्यों मंे करने का प्रयास करना चाहिए। अनेक लोग ऐसे भी होते हैं जो अपनी शक्ति का गलत दिशा में गलत प्रयोग कर लेते हैं। आदमी को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि जीवन में अच्छा कार्य करने का प्रयास होना चाहिए। जो भी अच्छा कार्य हो, उस कार्य मंे अपनी शक्ति का नियोजन करने का प्रयास करना चाहिए। भीतर में अच्छी बुद्धि हो तो उससे किसी की समस्या का समाधान करने का प्रयास करना चाहिए। बुद्धि के द्वारा परेशानियों का खड़ा किया जा सकता है। यह आदमी पर निर्भर करता है कि वह अपनी बुद्धि का उपयोग कैसे करता है। आदमी की बुद्धि का उपयोग रचनात्मक कार्यों में करने का प्रयास हो।
प्रेक्षाध्यान की बात है। इसके द्वारा आदमी अपनी आत्मा का उत्थान करे। प्रेक्षाध्यान के द्वारा भी आध्यात्मिक विकास हो सकता है। प्रेक्षाध्यान के द्वारा मानसिक शांति को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। बुरे विचारों को शांत अथवा कमजोर करने का प्रयास करना चाहिए। यह अध्यात्म की साधना का एक अंग है। प्रेक्षाध्यान के द्वारा आदमी अपनी आत्मा में रहने की कला को सीख ले तो बहुत बड़ी बात हो जाती है। राग-द्वेष से मुक्त रहने का अभ्यास हो, अहिंसा के पथ पर चलने का प्रयास हो। जीवन को पवित्र बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में अंतर्राष्ट्रीय प्रेक्षाध्यान शिविर का आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में मंचीय उपक्रम रहा। इस संदर्भ में रूस के कुरगन व क्रसनादा के लोगों ने सामूहिक रूप में प्रेक्षाध्यान गीत का संगान किया। स्टोनिया की रहने वाली डियाना ने शिविर के अपने अनुभवों को अभिव्यक्ति दी। रूस की पोलिना लूजेंस्की ने अपने अनुभवों को अभिव्यक्ति दी। यूक्रेन की इयोला ने अपने अनुभवों को साझा किया। सरबिया की ओल्गा, श्रीलंका के नरेनकुमार, नेपाल के किशोरसिंह शाही, कुरगन की इलेना, श्रीमती प्रिया बांठिया ने भी अपने-अपने अनुभवों को साझा किया। प्रेक्षा इन्टरनेशनल व अहमदाबाद चतुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष श्री अरविंद संचेती ने अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति दी।
इस संदर्भ में युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि जैन दर्शन में आत्मा और शरीर को अलग-अलग माना गया है। आत्मा शाश्वत और शरीर अशाश्वत अथवा अनित्य है। प्रेक्षाध्यान आध्यात्मिक अभ्यास है, जो आचार्यश्री तुलसी के समय प्रारम्भ हुई। प्रेक्षाध्यान के द्वारा अपनी आत्मा का कल्याण किया जा सकता है। आचार्यश्री के मंगलपाठ से कार्यक्रम सुसम्पन्न हुआ। इस उपक्रम का संचालन प्रेक्षाध्यान के आध्यात्मिक पर्यवेक्षक मुनि कुमारश्रमणजी ने किया।













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