लाडनूं : शनिवार को प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय को पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि जैन दर्शन में पुनर्जन्म का सिद्धांत प्राप्त होता है। जब उसे मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती, उसे आगे से आगे जन्म लेना होता है। उसका अगला जन्म कहां होगा और इस जन्म से पहले कहां था ऐसा प्रश्न हो सकता है? पूर्वजन्म को जानने से भी ज्यादा मुश्किल पुनर्जन्म को जानना हो सकता है। शास्त्रकार ने बताया है कि जो अज्ञानी, मूर्ख, अधर्मी लोग जो बाल जीव होते हैं, वे मनुष्य जीवन को छोड़कर नरक में पैदा होते हैं। जो धीर पुरुष होता है, वीर और गंभीर भी होता है, वह आदमी गरिमापूर्ण होता है। आदमी को अपने जीवन में धीरता, वीरता और गंभीरता का विकास हो जाए तो जीवन कितना अच्छा हो सकता है।
जो बुद्धि से युक्त होता है और परीषहों में अविचलित रहने वाला होता है, वह धीर होता है। दुनिया में बुद्धिमान लोग भी मिल सकते हैं। उनमें स्मृति शक्ति भी अच्छी होती है। छोटे साधु-साध्वियों को तो अधिक-अधिक ज्ञान कंठस्थ करने का प्रयास करना चाहिए। बुद्धि का होना जीवन की बड़ी उपलब्धि होती है। बुद्धि का बढ़िया उपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। कोई अपनी बुद्धि से लोगों का कल्याण करने का प्रयास करे, वह बहुत अच्छा आदमी होता है। विकार के हेतु के समक्ष रहते हुए भी जो शांति में होता है, वह धीर होता है। साधु को धीर बनने का प्रयास करना चाहिए।
इसी प्रकार आदमी हो अथवा साधु उसे वीर भी होने का प्रयास करना चाहिए। कोई समस्या भी आ जाए तो उसे दृढ़ता व मानसिक मनोबल से उन स्थितियों से निकलने का प्रयास करना चाहिए। वीरता के लिए शारीरिक सक्षमता भी आवश्यक होती है। शरीर की अनुकूलता हो और मनोबल अच्छा रहे तो वीरता भी बनी रहती है। इसी प्रकार जिस आदमी में गंभीरता भी होती है, वह जीवन में उच्चता को प्राप्त कर सकता है। मानव में ज्ञान की गहराई हो और आचरणों की ऊंचाई हो, मनस्वी आदमी में ऊंचाई और गहराई दोनों होना चाहिए। जितना संभव हो सके, आदमी को अपने भीतर धीरता रखने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री ने योगक्षेम वर्ष के दौरान शिक्षण-प्रशिक्षण में समय नियोजित करने की प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि शिक्षण के बाद परीक्षा भी होना चाहिए। प्रशिक्षण आयोग की समीक्षा के बाद आचार्यश्री ने परीक्षा आदि के संदर्भ में की गई व्यवस्थाओं आदि की जानकारी चारित्रात्माओं को प्रदान की।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को समाहित किया। इसके पूर्व आचार्यश्री के मंगल प्रवचन से पूर्व साध्वीवृंद ने प्रज्ञा गीत का संगान किया। आचार्यश्री ने मंगल प्रवचन से पूर्व कुछ समय तक ध्यान का प्रयोग कराया।













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