नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी भी धर्म को सुधार के नाम पर उसके मूल स्वरूप से “खोखला” नहीं किया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह टिप्पणी सबरीमाला मंदिर से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की।
पीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, लेकिन इसके साथ यह भी आवश्यक है कि न्यायालय आस्था, परंपरा और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखे। अदालत ने कहा कि लंबे समय से चली आ रही धार्मिक परंपराओं को केवल सुधार के नाम पर पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता।
सुनवाई के दौरान पीठ ने यह भी कहा कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्थाओं को न तो हल्के में लिया जा सकता है और न ही उन्हें सरलता से “गलत” ठहराया जा सकता है। न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थाओं के अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है।
यह मामला मुख्य रूप से सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और उससे जुड़े पहले के न्यायिक फैसलों की समीक्षा से संबंधित है। 2018 के सुप्रीम कोर्ट फैसले के बाद उत्पन्न विवादों और कानूनी प्रश्नों पर अब नौ जजों की बड़ी पीठ विचार कर रही है।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब देश में धार्मिक परंपराओं, सुधारों और संवैधानिक अधिकारों को लेकर बहस लगातार जारी है। अदालत ने संकेत दिया है कि किसी भी सुधार प्रक्रिया में धार्मिक परंपराओं की मूल पहचान और संवैधानिक दायरे का ध्यान रखना अनिवार्य है।













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