जयपुर : निर्माण नगर स्थित एक विद्यालय के संबोधि सभागार में बुधवार को आयोजित आध्यात्मिक प्रवचन में मुनि श्री तत्त्व रुचि जी “तरुण” ने जीवन में सत्संगति के महत्व पर गहन प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जीवन की उन्नति और अवनति का मूल आधार संगति ही है। सत्संगति उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है, जबकि कुसंगति अवनति की ओर ले जाती है। इसलिए उन्नति की आकांक्षा रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को कुसंगति से बचकर सत्संगति का आश्रय लेना चाहिए।
मुनि श्री ने प्रेरक दृष्टांत देते हुए कहा कि जिस प्रकार एक दीपक से अनेक दीपक प्रज्वलित किए जा सकते हैं, उसी प्रकार सत्संगति से असंख्य लोगों के जीवन में आत्मोन्नति का प्रकाश फैलाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि संगति केवल व्यक्तिगत जीवन को ही नहीं, बल्कि सामाजिक दृष्टि को भी प्रभावित करती है। समाज भी व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी संगति के आधार पर करता है। उत्तम संगति करने वाले व्यक्ति को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है, जबकि कुसंगति में रहने वाले को समाज निम्न दृष्टि से आंकता है।
उन्होंने विशेष रूप से बल देते हुए कहा कि सदैव श्रेष्ठ, सज्जन और सद्गुणी व्यक्तियों की संगति करनी चाहिए, क्योंकि संगति का प्रभाव जीवन की दिशा और दशा दोनों को बदल देता है।
इस अवसर पर मुनि श्री संभव कुमार जी ने भी उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि साधुओं की संगति सौभाग्य से प्राप्त होती है और यह जीवन में अत्यंत लाभकारी सिद्ध होती है। एक क्षण की भी सत्पुरुषों की संगति व्यक्ति के जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि जो परिवर्तन सत्संगति से आता है, वह केवल तकनीक या कृत्रिम बुद्धिमत्ता से संभव नहीं हो सकता, क्योंकि सत्संगति आत्मा को जागृत करती है।
कार्यक्रम का शुभारंभ तीर्थंकर ऋषभ प्रभु की स्तुति के साथ हुआ। इसके पश्चात ध्यान, स्वाध्याय, जप और तप का क्रम भी संपन्न हुआ। अंत में मंगल मंत्रोच्चार और जयघोषों के साथ प्रवचन सभा का समापन हुआ।













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