नई दिल्ली: प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत देश में वित्तीय समावेशन को गति देने के उद्देश्य से खोले गए खातों में अब बड़ी संख्या में निष्क्रियता सामने आई है। ताजा आंकड़ों के अनुसार देशभर में लगभग 14.38 करोड़ जन धन खाते लंबे समय से किसी भी प्रकार के लेन-देन के बिना निष्क्रिय पड़े हैं, जो कुल खातों का एक बड़ा हिस्सा है।
सरकारी और निजी बैंकों से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2026 तक जन धन खातों की कुल संख्या 58 करोड़ से अधिक हो चुकी थी, लेकिन इनमें से करोड़ों खाते अब उपयोग में नहीं हैं।
सरकारी बैंकों में निष्क्रिय खातों की संख्या अधिक देखी गई है। भारतीय स्टेट बैंक सहित अन्य प्रमुख सरकारी बैंकों में बड़ी संख्या में खाते लंबे समय से लेन-देन से बाहर हैं। वहीं, निजी क्षेत्र के बैंकों में भी निष्क्रिय खातों का अनुपात चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कई खाताधारकों ने योजना की शुरुआती अवधि में खाता तो खुलवा लिया, लेकिन बाद में नियमित उपयोग नहीं किया। इसके अलावा केवाईसी अपडेट न होना, प्रवासी श्रमिकों का स्थानांतरण, और वित्तीय जागरूकता की कमी भी प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।
भारतीय रिज़र्व बैंक के मानकों के अनुसार यदि किसी खाते में दो वर्ष तक कोई लेन-देन नहीं होता है तो उसे निष्क्रिय खाता घोषित कर दिया जाता है।
सरकार और बैंकिंग संस्थान समय-समय पर ऐसे खातों को पुनः सक्रिय करने के लिए अभियान चलाते रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद निष्क्रिय खातों की संख्या में उल्लेखनीय कमी नहीं आई है।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि जन धन योजना ने बैंकिंग प्रणाली को व्यापक स्तर पर जन-जन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन अब चुनौती इन खातों को सक्रिय और उपयोगी बनाए रखने की है।













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