पहलगाम की रक्तरंजित धरती पर जब निर्दोष नागरिकों का रक्त बहा, तब केवल कुछ परिवार नहीं उजड़े थे, बल्कि भारत की आत्मा को चुनौती दी गई थी। वर्षों से सीमापार आतंकवाद की आग में झुलसते भारत ने अनेक बार संयम दिखाया, कूटनीति का मार्ग अपनाया और विश्व समुदाय को यह समझाने का प्रयास किया कि आतंकवाद केवल भारत की समस्या नहीं, बल्कि मानवता के विरुद्ध युद्ध है। किंतु हर बार पाकिस्तान की धरती से पनपे आतंक के कारखानों ने यह सिद्ध किया कि वहां सत्ता चाहे किसी की भी हो, आतंकवाद उसकी रणनीतिक नीति का स्थायी उपकरण बना हुआ है।
ऐसे समय में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ केवल एक सैन्य अभियान नहीं था, बल्कि यह भारत की बदलती राष्ट्रीय चेतना का उद्घोष था। यह उस नए भारत का परिचय था, जो अपने सैनिकों के ताबूत गिनकर मौन नहीं बैठता, बल्कि हमले की जड़ तक पहुंचकर जवाब देता है। यह पहली बार नहीं था जब भारत ने सीमापार कार्रवाई की, लेकिन इस बार संदेश कहीं अधिक व्यापक, स्पष्ट और कठोर था—यदि आतंक सीमा पार से आएगा, तो प्रतिकार भी सीमा पार जाकर ही होगा।
वर्षों तक भारत पर यह दबाव बनाया जाता रहा कि वह “संयम” रखे। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शांति की सीख देने वाले अनेक देशों ने कभी पाकिस्तान के आतंक तंत्र पर उतनी कठोरता नहीं दिखाई, जितनी भारत से अपेक्षा की। लेकिन इतिहास गवाह है कि शांति की भाषा वही राष्ट्र प्रभावी ढंग से बोल सकता है, जिसकी शक्ति पर किसी को संदेह न हो। दुर्बलता कभी शांति की गारंटी नहीं बनती; वह केवल आक्रमण को आमंत्रण देती है।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने इसी भ्रम को तोड़ा। भारतीय सेनाओं ने जिस सटीकता और गति से आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया, उसने यह सिद्ध किया कि भारत अब केवल प्रतिक्रिया देने वाला राष्ट्र नहीं, बल्कि रणनीतिक पहल करने वाला राष्ट्र बन चुका है। यह अभियान सैन्य क्षमता का प्रदर्शन भर नहीं था; यह राजनीतिक इच्छाशक्ति की परीक्षा भी थी, जिसमें भारत सफल होकर उभरा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस अभियान ने भारत की सुरक्षा नीति को नई दिशा दी है। अब आतंकवाद को केवल “कानून-व्यवस्था” का विषय नहीं माना जा रहा, बल्कि राष्ट्रीय संप्रभुता पर सीधा आक्रमण समझा जा रहा है। यही कारण है कि भारत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आतंक और वार्ता साथ-साथ नहीं चल सकते। यह संदेश केवल पाकिस्तान के लिए नहीं, बल्कि उन सभी शक्तियों के लिए था जो आतंकवाद को अपने भू-राजनीतिक हितों के औजार के रूप में उपयोग करती हैं।
हालांकि किसी भी सैन्य कार्रवाई का महिमामंडन लोकतांत्रिक समाज के लिए उचित नहीं माना जा सकता। युद्ध अंततः विनाश ही लाता है। लेकिन जब शांति को बार-बार कायरता समझा जाने लगे, जब निर्दोषों की हत्या को रणनीतिक सफलता मान लिया जाए, तब प्रतिकार केवल अधिकार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दायित्व बन जाता है। भारत ने यही किया।
आज आवश्यकता केवल सैन्य शक्ति बढ़ाने की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और रणनीतिक स्पष्टता बनाए रखने की भी है। आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई केवल सीमा पर सैनिक नहीं लड़ते; यह लड़ाई राष्ट्र की सामूहिक चेतना भी लड़ती है। यदि देश भीतर से विभाजित होगा, तो बाहरी शत्रु सदैव अवसर खोज लेंगे।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ इतिहास के पन्नों में केवल एक सैन्य कार्रवाई के रूप में दर्ज नहीं होगा। इसे उस क्षण के रूप में याद किया जाएगा, जब भारत ने दुनिया को यह बता दिया कि अब वह रक्तपात सहने वाला राष्ट्र नहीं, बल्कि अपने नागरिकों की रक्षा के लिए निर्णायक प्रतिकार करने वाला राष्ट्र है। यह अभियान केवल बदले की कहानी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान, सुरक्षा और संकल्प की नई परिभाषा है।













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