लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ की राजधानी लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती परिसर में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, शांतिदूत, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी योगक्षेम वर्ष का मंगल प्रवास कर रहे हैं। लोग जहां अपने-अपने क्षेत्र में एक दिन के प्रवास के लिए कितने दिनों तक गुरुचरणों में अर्जी लगाते रहते हैं, वहीं लाडनूं में आचार्यश्री अपनी विशाल धवल सेना के साथ एक वर्ष से भी अधिक समय तक का पावन प्रवास कर रहे हैं। यह सौभाग्य प्राप्त कर लाडनूंवासी धन्य-धन्य हो गए हैं। तभी तो वर्षों से दूर देश में रहने वाले श्रद्धालु भी इस सुअवसर का लाभ उठाने के लिए अपने अपने गांव, नगर में पहुंच चुके हैं। लगभग 37 वर्षों बाद यह सौभाग्य लाडनूंवासियों के लिए मानों स्वर्णिम काल है। आचार्यश्री के श्रीमुख से निरंतर प्रवाहित होने वाली ज्ञानगंगा भी श्रद्धालुओं के मानस को निरंतर अभिसिंचन प्रदान कर रही है।
मंगलवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘आत्मा का स्वरूप’ को विवेचित करते हुए कहा कि आत्मा है या नहीं? मनुष्य के जीवन में कोई शाश्वत आत्मा है या नहीं या जितना जीवनकाल है, उतना ही है और आगे-पीछे कोई आत्मा जैसी चीज नहीं है? इस विषय में शास्त्र में कुछ बताई गई हैं। कहा गया है कि जो आत्मा के शाश्वत स्वरूप को मान लेता है, वह आस्तिक आदमी होता है। जो आत्मा के शाश्वत अस्तित्व को मान लेता है, वह पुनर्जन्म, स्वर्ग-नरक, आदि-आदि विषय को भी स्वीकार किया जा सकता है। आत्मा का शाश्वत स्वरूप होता है।
आत्मा इन्द्रियों के द्वारा ग्राह्य नहीं है। आत्मा को आंखों से नहीं देखा जा सकता, न कान से उसकी आवाज सुनी जा सकती है, न ही उसमें से कोई गंध-सुगंध आती है, न कोई उसमें स्वाद है, न ही आत्मा कोई स्पर्श कर सकता है। इन पांचों इन्द्रियों से आत्मा को जाना नहीं जा सकता। पुद्गल इन्द्रियों से ग्राह्य होते हैं। आत्मा अमूर्त होती है। इसलिए आत्मा इन्द्रियों द्वारा ग्राह्य नहीं होती। अमूर्त होने के कारण आत्मा नित्य ही है। आत्मा को खण्डित नहीं किया जा सकता।
आत्मा को कर्मों का बंधन होता है, जिस कारण वह इस संसार में बार-बार जन्म लेती है और मृत्यु को प्राप्त होती है। जीव जो भी कर्म करता है, उसके अनुरूप उसकी आत्मा से कर्म पुद्गल चिपक जाते हैं। आश्रवों के कारण आत्मा के साथ कर्म का बंधन होता रहता है। जिस प्राणी को मन होता है, उसकी आत्मा को ज्यादा बंध होता है। जिस प्राणी को मन नहीं होता, उनके कर्मों के बंध भी कम होते हैं। संज्ञी प्राणी ही सबसे नीचे स्तर के नरक में जा सकता है और संज्ञी मनुष्य ही कभी आगे चलकर मोक्ष को प्राप्त कर सकता है, केवलज्ञानी बन सकता है। मन का होना विकास का परिचायक होता है। मन से आदमी धर्म करे, अच्छा कार्य करे, सेवा करे तो और अधिक उन्नयन हो सकता है। संज्ञी मनुष्य साधना के उच्च शिखर को भी प्राप्त कर सकते हैं और बुरा करे तो सातवीं नरक तक जा सकता है। मंगल प्रवचन के दौरान आचार्यश्री ने साधु, साध्वियों, समणियों व मुमुक्षुओं को जैन दर्शन में विद्वान व विदुषी बनने हेतु अभिप्रेरित किया।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं को अपनी जिज्ञासाओं को प्रस्तुत करने का भी अवसर प्रदान किया। चारित्रात्माओं द्वारा अपनी जिज्ञासाओं को अभिव्यक्त किया गया तो आचार्यश्री ने उसे उत्तरित किया। आचार्यश्री की अभिवंदना का क्रम भी अभी चल ही रहा है। आज आचार्यश्री की अभिवंदना में मुनि कैवल्यकुमारजी व मुनि धवलकुमारजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। श्री संजय भानावत ने गीत का संगान किया।













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