आज के समय में भारत की विदेश नीति केवल सरकारी दस्तावेज़ों और कूटनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि वह समाज के भीतर, विशेषकर युवाओं की सोच में गहराई से प्रवेश कर चुकी है। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन द्वारा जारी विदेश नीति सर्वेक्षण २०२५ इसी बदलते मानसिक परिदृश्य का महत्वपूर्ण संकेत देता है।
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के इस अध्ययन में जो तस्वीर उभरकर सामने आती है, वह यह दर्शाती है कि भारतीय युवा अब वैश्विक घटनाओं को केवल दर्शक की तरह नहीं देखते, बल्कि एक सक्रिय और निर्णायक दृष्टिकोण के साथ उनका मूल्यांकन करते हैं।
सुरक्षा और जवाबी नीति के प्रति स्पष्ट समर्थन
सर्वेक्षण के अनुसार शहरी युवा वर्ग में भारत की सुरक्षा नीति को लेकर मजबूत समर्थन मौजूद है। विशेषकर ऑपरेशन सिंदूर को लेकर व्यक्त राय यह संकेत देती है कि युवा आतंकवाद के खिलाफ कठोर और त्वरित कार्रवाई को आवश्यक मानते हैं।
पहलगाम में हुए आतंकी हमले और उसके बाद की परिस्थितियों ने इस दृष्टिकोण को और अधिक सुदृढ़ किया है। युवाओं के बीच यह भावना स्पष्ट दिखती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न पर किसी भी प्रकार की ढिलाई स्वीकार्य नहीं हो सकती।
इसके साथ ही सिंधु जल संधि को स्थगित करने जैसे निर्णयों के समर्थन से यह भी स्पष्ट होता है कि नीति के स्तर पर “कूटनीति बनाम कठोरता” की बहस अब नए सिरे से परिभाषित हो रही है।
वैश्विक संस्थाओं पर पुनर्विचार की प्रवृत्ति
सर्वेक्षण का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि युवा भारतीय वैश्विक संस्थाओं की संरचना में सुधार के पक्ष में हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग केवल राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था में भारत की वास्तविक भूमिका के अनुरूप प्रतिनिधित्व की अपेक्षा को दर्शाती है।
यह प्रवृत्ति बताती है कि युवा पीढ़ी अब मौजूदा अंतरराष्ट्रीय ढांचे को अपरिवर्तनीय नहीं मानती, बल्कि उसमें परिवर्तन को आवश्यक समझती है।
साझेदारियों का पुनर्संतुलन
विदेश नीति के संदर्भ में एक उल्लेखनीय बदलाव यह है कि पारंपरिक विश्वसनीय साझेदारियों का पुनर्मूल्यांकन हो रहा है। जहाँ पहले कुछ देशों को स्वाभाविक रणनीतिक साझेदार माना जाता था, वहीं अब भरोसे का पैमाना अधिक व्यावहारिक और परिणाम आधारित हो गया है।
रूस और जापान जैसे देशों के प्रति बढ़ता भरोसा तथा अमेरिका के प्रति अपेक्षाकृत घटती विश्वसनीयता इस बात का संकेत है कि भारतीय युवा विदेश नीति को भावनात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से देख रहे हैं।
इसके साथ ही ब्रिक्स जैसे मंचों को पश्चिमी प्रभुत्व के विकल्प के रूप में देखना यह दर्शाता है कि वैश्विक शक्ति-संतुलन की समझ अब युवाओं में गहराई से विकसित हो रही है।
मध्य पूर्व की नई भूमिका
सर्वेक्षण में सबसे महत्वपूर्ण उभरता हुआ पहलू मध्य पूर्व को लेकर बदलता दृष्टिकोण है। भारतीय युवा इस क्षेत्र को अब केवल ऊर्जा आपूर्ति या प्रवासी श्रम के दृष्टिकोण से नहीं देखते, बल्कि एक आर्थिक और तकनीकी अवसर क्षेत्र के रूप में देखते हैं।
आईमेइक और आईटूयूटू जैसी पहलों को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण यह संकेत देता है कि भारत की बहुस्तरीय कूटनीति को युवा वर्ग समझ भी रहा है और उसका समर्थन भी कर रहा है।
संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के साथ गहरे होते आर्थिक संबंध इस धारणा को और मजबूत करते हैं कि भविष्य की वैश्विक वृद्धि में यह क्षेत्र निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
बदलती राष्ट्रीय चेतना का संकेत
यह सर्वेक्षण केवल आंकड़ों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह उस पीढ़ी की मानसिकता का प्रतिबिंब है जो आने वाले समय में भारत की नीतिगत दिशा को प्रभावित करेगी। सुरक्षा, कूटनीति, वैश्विक संस्थान और आर्थिक साझेदारियाँ—इन सभी पर युवाओं का स्पष्ट और तीव्र मत यह दर्शाता है कि भारत अब एक आत्मविश्वासी वैश्विक शक्ति की ओर बढ़ रहा है।
आज का युवा केवल प्रश्न नहीं पूछ रहा, वह उत्तर भी तय कर रहा है—और यही इस परिवर्तन की सबसे बड़ी पहचान है।













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