लाडनूं : योगक्षेम वर्ष के मंगल प्रवास के दौरान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी प्रतिदिन के लिए निर्धारित विषय के आधार पर अपना मंगल प्रवचन प्रदान कर रहें हैं। निर्धारित विषय को आचार्यश्री आगम में वर्णित श्लोक आदि के द्वारा इतनी सरस व्याख्या प्रदान कर रहे हैं, जिसका पूर्ण लाभ चतुर्विध धर्मसंघ को प्राप्त हो रहा है। नित्य प्रति आचार्यश्री के श्रीमुख से प्रसरित होने वाली अमृतवाणी का रसपान करने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित हो रहे हैं।
नित्य की भांति गुरुवार को भी सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘प्रिय-अप्रिय: सब सहें’ को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि प्रिय-अप्रिय सब सहें। आदमी के जीवन में अनुकूलता की स्थितियां भी आती हैं और कई बार प्रतिकूल परिस्थितियों से भी आदमी का सामना हो जाता है। कोई आदमी किसी के कार्यों की प्रशंसा करता है तो कभी कोई ऐसा भी मिल सकता है कि उसकी निंदा कर दे, अपमान कर दे। आदमी को दोनों ही परिस्थितियों में समता रखने का प्रयास करना चाहिए। निंदा करे अथवा कोई वंदन भी करे, कोई विरोध करे, लेकिन ऐसी स्थिति में साधु को भी समता, शांति रखने का प्रयास करना चाहिए।
समता को धर्म कहा गया है। लाभ-अलाभ, निंदा-प्रशंसा, मान-अपमान और जन्म-मृत्यु-ये सभी द्वन्दात्मक स्थितियां हैं। इन सभी परस्थितियों को समता में रहने का प्रयास करना चाहिए। साधु को जो भी प्राप्त हो जाए, उसमें समता-शांति रखने का प्रयास करना चाहिए। साधु को गोचरी मिले तो भी ठीक है और न भी मिले तो भी उसे तप मानकर उस स्थिति को समता भाव रखने का प्रयास करना चाहिए। साधु को किसी भी परिस्थिति में समता रखना ही चाहिए।
साधु के लिए कहा गया कि साधु मान-अपमान, प्रिय-अप्रिय सभी को सहन करने का प्रयास करना चाहिए। गृहस्थ के घर कभी लक्ष्मी का आगमन हो या लक्ष्मी चली जाएं, दोनों परिस्थितियों में समता-शांति रखने का प्रयास करना चाहिए और न्यायसंगत मार्ग को से विचलित नहीं होना चाहिए। जो धीर पुरुष होते हैं, वे किसी भी परिस्थिति से विचलित नहीं होते। व्यापार में कभी लाभ अधिक हो जाए और कभी नुक्सान हो जाए, ऐसी स्थिति में भी समता-शांति रखने का प्रयास करना चाहिए। परिवार में भी इस प्रकार की अनुकूल अथवा प्रतिकूल स्थिति आए तो भी आदमी को समता रखने का प्रयास करना चाहिए।
आदमी को अपनी समता को अपने हाथ में रखने में का प्रयास करना चाहिए। आदमी को अपना जो भी कर्त्तव्य है, वह करने का प्रयास करना चाहिए। दूसरे के कहने से कोई चोर नहीं और दूसरे के कहने से कोई साधु या साहूकार नहीं हो सकता, इसलिए आदमी को समता-शांति में रखने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को स्वयं अपना आंकलन करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को अच्छे कार्यों में पुरुषार्थ करते रहने का प्रयास करना चाहिए। अच्छे क्षेत्र में कार्य करने का प्रयास करना चाहिए। परोपकार के समान कोई पुण्य नहीं और किसी दूसरों को पीड़ा देना, प्रताड़ित करने के समान कोई पाप नहीं होता। इसलिए आदमी को जहां तक हो सके, आवश्यकतानुसार सेवा करने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री ने योगक्षेम वर्ष के संदर्भ में कहा कि यह योगक्षेम वर्ष के कारण ही इतने-इतने साधु-साध्वियों का परिषद उपस्थित है। यहां कितने पुराने साधु-साध्वियों का समागम हो रहा है और इसका लाभ भी प्राप्त हो रहा है। इस समय का जितना अच्छा लाभ उठाया जा सकता है, उठाने का प्रयास करना चाहिए। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को भी उत्तरित किया।
कार्यक्रम के दौरान मुमुक्षु रुचिका मालू ने आचार्यश्री के समक्ष अपनी भावाभिव्यक्ति देते हुए दीक्षा देने की प्रार्थना की तो आचार्यश्री ने मुमुक्षु रुचिका को मंगल आशीष प्रदान करते हुए कहा कि भाद्रव शुक्ला नवमी अर्थात् 20 सितम्बर 2026 को इसी जैन विश्व भारती परिसर मंे साध्वी दीक्षा प्रदान करने का भाव है। आचार्यश्री के इस मंगल आशीर्वाद से पूरा प्रवचन पण्डाल जयघोष से गूंज उठा।













देश
राज्य-शहर
विदेश
बिजनेस
मनोरंजन
जीवंत