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Home आराधना-साधना

पांच इन्द्रियों व मन को नियंत्रित रखने का हो प्रयास : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

‘नियम व व्रत में सुस्थित रहें’ विषय को आचार्यश्री ने किया व्याख्यायित 

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July 5, 2026
in आराधना-साधना
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पांच इन्द्रियों व मन को नियंत्रित रखने का हो प्रयास : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण
लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, शांतिदूत, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने रविवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘नियम व व्रत में सुस्थित रहें’ को उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि आध्यात्मिक साधना की दृष्टि से नियम व व्रत का अति महत्त्वपूर्ण स्थान है, इसलिए सभी को नियम व व्रत में सुस्थित रहना चाहिए। नियम व व्रत स्वीकार करना एक बात होती है, किन्तु उसे निष्ठा तक पहुंचा देना, सफलता की बात होती है।
एक आदमी बचपन में साधु जीवन स्वीकार कर लिया। अब वह जब अपने नियम व व्रत में अंतिम श्वास तक सुस्थित रह जाए, वह विशेष बात होती है। यों तो नियम व व्रत को एकार्थक रूप में भी देखा जा सकता है। नय दृष्टि से भिन्नार्थक भी होते हैं। पांच इन्द्रियों और मन को नियंत्रित रखना, उनका नियमन करना नियम होता है। दीक्षा आदि व्रत होते हैं। परम पूजनीय आचार्यश्री तुलसी ने अणुव्रत आन्दोलन प्रारम्भ किया। उसमें भी व्रत शब्द जुड़ा है और साधुओं के लिए महाव्रत की बात बताई गई है। महाव्रत का विलोम शब्द है अणुव्रत है। अणुव्रत अर्थात छोटे-छोटे नियम जो आचार्यश्री तुलसी ने प्रस्तुत किए थे, इन व्रतों को स्वीकार कर आदमी अपने जीवन को अच्छा बना सकता है और अपनी आत्मा को पवित्र बना सकता है।
जो आदमी नियम, व्रतों का पालन करे, अच्छी साधना, आराधना, तपस्या आदि करे, उसे भी अच्छा धार्मिक-आध्यात्मिक लाभ प्राप्त हो सकता है। अपनी इन्द्रियों का संयम रखना भी बहुत अच्छी साधना है। पांच इन्द्रियों के अपने विषय और अपने व्यापार अर्थात् प्रवृत्तियां होती हैं। इनका नियंत्रण रखना बहुत अच्छी बात होती है। सभी इन्द्रियों का अपना-अपना कार्य क्षेत्र है।
आदमी को जब ध्यान करना हो तो वे कुछ सुनना बंद कर देते हैं। कोई-कोई तो कान में कुछ डाल लेते हैं, कोई विशेष साधनाशील होते हैं तो वे भीड़ में रहते हुए भी स्वयं में लीन हो जाते हैं और अपनी साधना कर लेते हैं। हालंाकि सबकी अपनी-अपनी स्थिति हो सकती है। कहीं-कहीं ध्यान-साधना के लिए साधना स्थल आदि भी बने होते हैं। नियत स्थानों पर पहुंचकर साधना करने के लिए अच्छा माहौल भी मिल सकता है। ध्याना लगाना है तो आदमी को अपने मन को अन्य चीजों से हटाकर ध्यान में रत हो जाने का भी प्रयास किया जा सकता है।
आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं के लिए बनाए गए सुप्रणिधान साधना का वर्णन करते हुए कहा कि इसके माध्यम से चारित्रात्मा अपनी अनुकूलतानुसार अपनी साधना को अच्छा बना सकते हैं। इसके माध्यम से इन्द्रियों का संयम और मन को संयमित रहकर किया जा सकता है।
साधारण आदमी को अपनी इन्द्रियों का संयम रखने का प्रयास करना चाहिए। जो अपने सुनने का विषय न हो तो उससे बचने का प्रयास करना चाहिए। जो शरीर के लिए अपेक्षित हो, जो अपने भोजन करने लायक हो, उसके ग्रहण कर लिया, अन्यथा जाने दिया। इस प्रकार आदमी को प्रत्येक कार्य को नियम और व्रत के अनुसार ही करने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार आदमी को अपनी इन्द्रियों के साथ-साथ अपने मन को भी नियंत्रित करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को अपने नियम-व्रत के प्रति जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिए। श्रावक समाज को भी अपने नियम-व्रत में लगे दोषों आदि के संदर्भ में आलोयणा-प्रायश्चित्त कर लेने का प्रयास करना चाहिए। इसके प्रति जागरूकता बनी रहे, ऐसा प्रयास होना चाहिए।
साधु समुदाय को तो नियम व व्रतों की अनुपालना के प्रति विशेष रूप से जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिए कि नियम व व्रत के माध्यम से अच्छी साधना हो, अच्छी सेवा हो, दूसरों का उपकार हो तो आत्मतोष की बात हो सकती है। इस प्रकार नियम-व्रतों में सुस्थित रहने का प्रयास करना चाहिए। नियम-व्रत में कहीं दोष लगा भी हो तो उसकी आलोयणा, प्रायश्चित्त आदि के माध्यम से शुद्ध हो जाने का प्रयास करना चाहिए। साधु के चित्त में समाधि रहे, निर्मलता रहे, ऐसा प्रयास होना चाहिए। साधु की आत्मा भी शांत-उपशांत रहे, ऐसा प्रयास होना चाहिए। सेवा के प्रति सतत जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिए।
बीदासर से आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में पहुंचे ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति दी।
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