जयपुर : तेरापंथ धर्मसंघ के आद्य प्रवर्तक एवं सत्य के पुजारी आचार्य श्री भिक्षु की जन्म त्रिशताब्दी के उपलक्ष्य में रविवार को श्याम नगर स्थित भिक्षु साधना केन्द्र में भव्य आध्यात्मिक समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम मुनिश्री तत्त्व रुचि जी “तरुण” एवं मुनिश्री संभव कुमार जी के सान्निध्य में संपन्न हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की।
“आचार्य श्री भिक्षु को जाने व पहचाने” विषय पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री तत्त्व रुचि जी “तरुण” ने कहा कि आचार्य श्री भिक्षु आत्मधर्म के यथार्थ व्याख्याकार थे। उन्होंने जिनवाणी के प्रति पूर्ण समर्पण रखते हुए सत्य का जो उद्घाटन किया, वह अद्वितीय और विलक्षण है। उन्होंने कहा कि आचार्य भिक्षु ने स्पष्ट रूप से बताया कि संसार और मुक्ति के मार्ग एक-दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं। जिस प्रकार पूर्व और पश्चिम का मेल संभव नहीं है, उसी प्रकार समाज धर्म और आत्मधर्म का भी कोई सामंजस्य नहीं हो सकता। जहाँ परपीड़न, मोह और भोग का पोषण होता है, वहाँ आत्मकल्याण संभव नहीं है।
मुनिश्री संभव कुमार जी ने अपने संबोधन में कहा कि शुद्ध साध्य की प्राप्ति के लिए साधन का भी शुद्ध होना अनिवार्य है। आत्मशुद्धि तभी संभव है, जब मनुष्य के भाव और उसकी क्रिया दोनों पूर्णतः विशुद्ध हों।
प्रवचन के दौरान मुनिश्रियों ने आचार्य भिक्षु के अहिंसा संबंधी विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि जो व्यक्ति स्वयं हिंसा नहीं करता, किंतु दूसरों से हिंसक कार्य कराता है अथवा उसमें सहयोग देता है, वह भी समान रूप से दोष का भागी होता है। उन्होंने बताया कि इस विषय में आचार्य श्री भिक्षु का मत महात्मा गांधी के विचारों से भी साम्य रखता है। दोनों ने ही हिंसा करने वाले के साथ-साथ उसे प्रेरित करने और उसमें सहयोग देने वाले को भी समान रूप से उत्तरदायी माना है।
कार्यक्रम का शुभारंभ तीर्थंकर अभिनंदन प्रभु की स्तुति से हुआ। श्रद्धालुओं ने तप एवं त्याग के संकल्पों के माध्यम से आचार्य श्री भिक्षु को श्रद्धांजलि अर्पित की। अंत में मंगल पाठ के साथ जन्म त्रिशताब्दी समारोह का समापन हुआ।













देश
राज्य-शहर
विदेश
बिजनेस
मनोरंजन
जीवंत