पुणे:अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण जी ने आज प्रातः ताम्हीनी ग्राम के श्री विंझाई देवी हाई स्कूल से मंगल विहार किया। पुणे की ओर अविरल गतिमान ज्योतिचरण अपनी धवल सेना के साथ पहाड़ी आरोह–अवरोह को पार करते हुए निरंतर गतिमान थे। विहार मार्ग में आज पहाड़ों के बीच फैली मुलशी झील एकदम निकटता से नजर आ रही थी। बताया गया की यह टाटा के पावर प्रोजेक्ट से जुड़ी हुई है। प्रायः सड़क मार्ग उससे लगा हुआ था। झील का विहंगम दृश्य राहगीरों को नयनाभिराम लग रहा था। एक ओर विशाल पर्वतमाला वही दूसरी ओर झील और घनी वृक्षावली। प्रकृति के इस सुरम्य वातावरण में करुणा, अहिंसा के संदेश के साथ युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जनोद्धार का लक्ष्य लिए गतिमान थे।
मार्ग में चाचीवली गांव के निकट एक जगह स्थानीय ग्रामीण व्यक्ति हाथों में कुछ पुष्प लेकर गुरुदेव के चरणों में अर्पित करने पहुंचा। उसे बताया गया की पुष्प सचित्त होने से साधु उसका स्पर्श नहीं करते तो उसने श्रद्धानत को गुरुदेव को वंदन किया। लगभग 12 किलोमीटर का विहार कर आचार्यश्री गोनावाड़ी के रेसीडेंसी लेक व्यू रिसोर्ट में प्रवास हेतु पधारे। रिसोर्ट के मैनेजर आदि कर्मकरों ने धवल सेना का भावभीना स्वागत किया।
मंगल प्रवचन में नव तत्वों का विवेचन करते हुए गुरुदेव ने कहा – जैन दर्शन में नव तत्वों का विवेचन मिलता है। जीव, अजीव, पुन्य, पाप, आश्रव, संवर, निर्जरा, बंध व मोक्ष। इन नव तत्वों की यथार्थ जानकारी व श्रद्धा हो जाय तो सम्यक्त्व की प्राप्ति संभव है। प्रश्न हो सकता है कि मैं कौन हूँ ? जिस शरीर से चलना, फिरना, खाना, पीना सब होता है, क्या मैं वही हूँ या कुछ और ? जो दिख रहा है वह शरीर तो विनाश-धर्मां है, नश्वर है किंतु आत्मा अविनाशी है। आत्मा को न तो अत्याधुनिक शस्त्रों से काटा का सकता है न छेदा जा सकता है। आत्मा अमूर्त होती है, वह दिखाई नहीं देती। आत्मा है तभी सब है उसके के निकल जाने के बाद सब बंद हो जाता है।
गुरुदेव ने आगे कहा कि शरीर मूलतः अजीव है। आश्रव के कारण कर्म आत्मा के चिपक जाते हैं। आश्रव को संवर व निर्जरा द्वारा समाप्त किया जा सकता है। संवर से, प्रत्याख्यान से कर्म बंध अवरुद्ध हो जाते हैं, नए कर्मों का आगमन रुक जाता है। पूर्वार्जित कर्मों को तोड़ने के लिए निर्जरा व तप है। सब कर्मों से मुक्त होने पर जीव मोक्ष को प्राप्त करता है। व्यक्ति वीतराग वाणी पर अटूट विश्वास रखे। सम्यक्त्व के समान कोई रत्न नहीं है। चारित्र भी सम्यक्त्व के बिना नहीं टिकता। सम्यक्त्व के बिना, सही श्रद्धा के बिना मुक्ति संभव नहीं। हमें अपने सम्यक्त्व को निर्मल व पुष्ट बनाने का प्रयास करना चाहिए।













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