पुणे: क्वीन ऑफ डेक्कन के नाम से प्रसिद्ध पुणे शहर का वातावरण आज कुछ बदला बदला सा नजर आ रहा था। अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य महाश्रमण के प्रथम बार पुणे शहर में पदार्पण से सकल समाज में हर्षोल्लास की अनूठी लहर दिखाई दे रही थी। महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी पुणे में आज का सूर्योदय एक स्वर्णिम प्रभात लिए हुआ जब 57 वर्षों बाद तेरापंथ के आचार्य का पुणे में शुभागमन हुआ। श्रद्धालुओं को वर्षों से संजोई आस आज गुरुदेव के प्रवेश से फलीभूत हो गई। 1968 में तेरापंथ के नवमेें गुरु आचार्य तुलसी पुणे पधारे थे। अब पुनः 57 वर्षों बाद आचार्य श्री महाश्रमण जी का ही यहां पदार्पण हुआ है। स्वागत जुलूस में ऐसा नजारा दिखाई दे रहा था कि दूर दूर तक जहां दृष्टि जाए लोग जय जय महाश्रमण के जय जयकारे लगाते नजर आरहे थे।
सुबह वाकडेवाड़ी से आचार्य श्री ने मंगल प्रस्थान किया। जैसे जैसे गुरु चरण शहर की ओर बढ़ते जा रहे थे स्वागत में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती जा रही थी। मार्ग में अनेक स्थानों पर खड़े श्रद्धालु आचार्य श्री का आशीर्वाद प्राप्त कर स्वयं को धन्य महसूस कर रहे थे। मार्ग में शनिवार वाड़ा किले के प्रांगण में भी गुरुदेव का पदार्पण हुआ। जहां पर विधायक सुनील कांबले, स्थानीय नेता श्री रविंदर धंगेकर आदि ने गुरुदेव का शहर शुभागमन पर स्वागत किया। मार्ग में प्रसिद्ध श्रीमंत दगडूसेठ गणपति मंदिर में गुरुदेव पधारे एवं मंगलपाठ का उच्चारण करवाया। बच्चे, बूढ़ों से लेकर युवक, महिलाएं गणवेश में स्वागत जुलूस में पंक्तिबद्ध हो अपने आराध्य का स्वागत कर रहे थे। लगभग 10 किलोमीटर का विहार तय कर गुरुदेव पांच दिवसीय प्रवास हेतु वर्धमान सांस्कृतिक भवन में पधारे।
सिमंदर समवसरण में उपस्थित विशाल जनमेदिनी को भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपनी अमृतवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि जीवन में समय का बहुत महत्त्व होता है। यह सभी प्राणियों को निःशुल्क प्राप्त होता है। चौबीस घंटे प्रतिदिन निःशुल्क रूप में प्राप्त हो जाता है। मेघ की बरसात की भांति समय की बरसात भी सभी के लिए एक समान होती है। शास्त्रकार ने कहा कि पंडित समय को जानकर उसका मूल्यांकन करने का प्रयास करें। मनुष्य जन्म को प्राप्त करना भी विशेष बात है, क्योंकि मनुष्य जन्म को दुर्लभ बताया गया है और जिसे दुर्लभ कहा गया है, वह अभी हम सभी को प्राप्त है। इस मानव जीवन में धर्म की प्राप्ति होना, धर्म को सुनने को मिल जाना और धर्म की जानकारी प्राप्त करना भी बड़ी बात होती है।
आदमी को अपने जीवन को धर्ममय बनाने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में अहिंसा, ईमानदारी, नैतिकता के पुष्ट बने रहें। आदमी कहीं भी रहे, कुछ भी करे, उसमें ईमानदारी रखने का प्रयास करे। दुकानदारी में ईमानदारी रहे। चलते-चलते भी कीड़े-मकोड़ों को बचाते हुए जितनी दया का भाव रख लिया तो धर्म साथ रह सकता है। इस प्रकार आदमी अपने कर्म के साथ धर्म जुड़ जाए तो इस मानव जीवन का कल्याण हो सकता है और दुर्लभ मानव जीवन सार्थक हो सकता है।
आचार्यश्री ने कहा कि आज हम पूना के इस स्थान में आए हैं। यहां के सभी समाज में धर्म के प्रति अच्छी जागरूकता रहे। पुणे तेरापंथी सभा के अध्यक्ष श्री महावीर कटारिया, पुणे व्यवस्था समिति के संयोजक श्री महेन्द्र मरलेचा, स्वागताध्यक्ष श्री रतनमल दूगड़ ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। पुणे तेरापंथ समाज ने स्वागत गीत का संगान किया।













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