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Home आराधना-साधना

भोग से योग की ओर गति करे मानव : युगप्रधान आचार्य महाश्रमण

बीड की धरा को पावन बनाने के लिए महातपस्वी ने किया 14 कि.मी. का प्रलंब विहार 

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April 26, 2024
in आराधना-साधना
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बीड:जन-जन के मानसिक आतप को दूर कर आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी शुक्रवार को अपनी धवल सेना संग बीड़ जिला मुख्यालय पधारे। ऐसे महामानव के दर्शन को बीड़ का जन-जन उमड़ पड़ा। मानवीय मूल्यों की स्थापना, सद्भाव का प्रभाव बढ़ाने, नैतिकता के गुण बताने और नशामुक्ति जैसी बुराइयों से बचने की प्रेरणा प्रदान करने वाले आचार्यश्री महाश्रमणजी का बीड़वासियों ने भावभीना स्वागत एवं अभिनंदन किया। सभी पर समान रूप से आशीष बरसाते हुए आचार्यश्री बीड के दो दिवसीय के प्रथम दिन के प्रवास हेतु चंपावती हाईस्कूल में पधारे।
इसके पूर्व शुक्रवार को प्रातःकाल की मंगल बेला में आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मंगल प्रस्थान किया। बरसात से मिली राहत के उपरान्त आज आसमान बिल्कुल साफ था, इसलिए सूर्य अपनी पूर्ण तेजस्विता के साथ आसमान में गति कर रहे थे। उनके ऊर्ध्वारोहण के साथ ही धूप की तीव्रता भी बढ़ती गई और धरती मानों तपने लगी, किन्तु प्राकृतिक अनुकूलता-प्रतिकूलता से सर्वथा अप्रभावित आचार्यश्री गंतव्य की ओर गतिमान थे। पहाड़ों को काट कर बनाए गए रास्ते पर स्थान-स्थान पर भक्ति भावना से भरे ग्रामीण आचार्यश्री को भेंट करने के लिए दूध, रुपए आदि लेकर उपस्थित हो रहे थे, किन्तु जैन साधुचर्या की जानकारी देकर उन्हें रोका जा रहा था। आचार्यश्री उनके श्रद्धा भावों को ग्रहण कर मंगल आशीर्वाद प्रदान करते हुए बढ़ते जा रहे थे। लगभग चौदह किलोमीटर का प्रलम्ब विहार कर आचार्यश्री बीड क्षेत्र में पधारे, जहां जनता ने भव्य स्वागत किया।
चंपावती हाईस्कूल प्रांगण में ही उपस्थित जनता को मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन आशीष प्रदान करते हुए कहा कि दो शब्द बताए गए हैं- भोग और योग। इससे मिलता-जुलता तीसरा शब्द है रोग। पहले में भ, दूसरे में य और तीसरे में र जुड़ा हुआ है। आदमी शब्द, रूप, रस का उपभोग करता है। आदमी पांच इन्द्रियों के विषयों का भोग करता है, साथ में आसक्ति भी जुड़ सकती है। इन्द्रिय विषयों का आसक्ति के साथ भोग करना ही आदमी को जन्म-मृत्यु के चक्र में घुमाने वाला बन सकता है। इसलिए कहा गया है कि भोगी संसार में भ्रमण करता है और योगी इससे मुक्त हो जाता है। आदमी को शारीरिक रोग भी होता है और मानसिक रोग भी हो सकता है। जहां विषयों का आसक्ति के साथ अतिसेवन है, वहां रोग व तकलीफ भी हो सकती है। ज्यादा खा लेने से उदर संबंधी समस्या हो सकती है। इस प्रकार भोग मानों रोग को पैदा करने का निमित्त बन जाता है। आदमी खाने में संयम धर्म की चेतना के साथ किया जाता है तो वह संयम योग हो जाता है और उसे रोग से मुक्ति भी मिल जाती है।
इसलिए कहा कि आदमी को भोग से योग की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। अष्टांग योग की बात बताई गई है। आसन, प्राणायाम आदि योग के अंग हैं। शास्त्र में एक स्थान पर बताया गया कि मोक्ष प्राप्ति के लिए किया गया सारा कार्य योग ही होता है। ज्ञान, दर्शन और चारित्र की साधना के द्वारा आदमी को योग की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। मानव जीवन को योग की दिशा में लगाने का प्रयास करना चाहिए। मानव जीवन में अच्छे धर्म के संस्कार आ जाएं तो आदमी के जीवन का कल्याण हो सकता है। योग से योग की ओर गति हो, आदमी खान-पान, रहन-सहन आदि संयम रखने का प्रयास करे तो शरीर भी अच्छा तथा धार्मिक लाभ भी प्राप्त हो सकता है।
आचार्यश्री ने आगे कहा कि वर्तमान में लोकतंत्र में लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। इसमें धर्म का समावेश कैसे हो, इसका ध्यान रखने का प्रयास करना चाहिए। इसमें नैतिकता, अहिंसा और नशामुक्ति के रूप में जुड़ाव रखने का प्रयास हो। इसमें भी आदमी को अनुशासन और कर्त्तव्यनिष्ठा रखने का प्रयास करना चाहिए। यदि लोकतंत्र में अनुशासन और कर्त्तव्य निष्ठा न हो तो लोकतंत्र की देवी मृत्यु और विनाश को प्राप्त हो सकती है।
आचार्यश्री के स्वागत में उपासक श्री सुभाष समदड़िया ने अपनी आस्थासिक्त अभिव्यक्ति दी। स्थानीय तेरापंथ महिला मण्डल की सदस्याओं ने स्वागत गीत का संगान किया।
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