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तेरापंथ धर्मसंघ के 11वें पट्टधर के 15वें पट्टोत्सव का भव्य समयोज

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Home आराधना-साधना

तेरापंथ धर्मसंघ के 11वें पट्टधर के 15वें पट्टोत्सव का भव्य समयोज

50वें दीक्षा कल्याण महोत्सव वर्ष के छहदिवसीय कार्यक्रम का दूसरा दिन 

ON THE DOT TEAM by ON THE DOT TEAM
May 18, 2024
in आराधना-साधना
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तेरापंथ धर्मसंघ के 11वें पट्टधर के 15वें पट्टोत्सव का भव्य समयोज
जालना:वैशाख शुक्ला दशमी। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ की आचार्य परंपरा के ग्यारहवें अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के 15वें पट्टोत्सव समारोह का दिवस। सम्पूर्ण तेरापंथ धर्मसंघ में उत्साह, उल्लास व उमंग का वातावरण। जालना की धरा पर आयोजित मुख्य 15वें पदारोहण समारोह में तो मानों चतुर्विध धर्मसंघ का उत्साह व उमंग अपने चरम पर नजर आ रहा था। जन-जन अपने वर्तमान अधिशास्ता के लिए करोड़ों दिवाली राज करने की कामना कर रहा था। देश भर के अन्य भागों से पहुंचे सैंकड़ों-सैंकड़ों श्रद्धालुओं की उपस्थिति से श्री गुरु गणेश तपोधाम परिसर मानों जनाकीर्ण नजर आ रहा था। जालनावासी तेरापंथ के इस ऐतिहासिक प्रसंग से जुड़कर इतिहास में अमर हो रहे थे।
इस परिसर में बने भव्य एवं विशाल संयम समवसरण निर्धारित समय से पूर्व ही श्रद्धालुओं की उपस्थिति से भरा हुआ था, किन्तु अभी भी महाराष्ट्र के विभिन्न हिस्सो से आने वाले श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ था। आज के कार्यक्रम के निर्धारित समय से पूर्व ही मानवता के मसीहा, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी मंच पर पधारे तो पूरा वातावरण श्रद्धालुओं के बुलंद जयघोष से गुंजायमान हो उठा। सामने की ओर उपस्थित विशाल जनमेदिनी तो आचार्यश्री के दोनों ओर उपस्थित साधु-साध्वियों की उपस्थिति। उन सभी के मध्य किसी सूर्य की भांति देदीप्यमान युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के महामंत्रोच्चार से आज महनीय कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। साधु-साध्वियां व श्रावक-श्राविकाओं ने करबद्ध होकर अपने ग्यारहवें अनुशास्ता में विभिन्न मंत्रों से वर्धापित किया। मुनि रत्नेशकुमारजी व मुनि ऋषिकुमारजी ने अपने-अपने गीत का संगान किया। मुनि अर्हमकुमारजी व मुनि विनम्रकुमारजी ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी।
तेरापंथ धर्मसंघ की नवमी साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने कहा कि आज के दिन तेरापंथ के इतिहास में गरिमामय अध्याय जुड़ा था। पूज्यप्रवर के सफल नेतृत्व में धर्मसंघ निरंतर विकास कर रहा है। आपके कुशल नेतृत्व में तेरापंथ धर्मसंघ की सभी संस्थाएं भी अपना निरंतर विकास कर रही हैं। आप संघ के कुशल सारथि हैं। आपका कुशल प्रबन्धन तो अवर्णनीय है। साध्वीप्रमुखाजी ने आज के अवसर पर आचार्यश्री को नयी पूंजणी उपहृत की।
मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी ने कहा कि आज का दिन तेरापंथ धर्मसंघ के लिए विशिष्ट दिन है। आज के दिन भगवान महावीर को परम ज्ञान की प्राप्ति हुई थी और आज के ही दिन आचार्यप्रवर तेरापंथ के ग्यारहवें अधिशास्ता के रूप में विधिवत पट्टासीन हुए थे। आपने अपने पदाभिषेक के इन चौदह वर्षों में वीतरागता की मनोग्य मूरत बन गए हैं। आपका शासनकाल साधना, समता, स्नेह व सम्मान से ओतप्रोत शासनकाल है।
मुख्यमुनिश्री की अभिवंदना के उपरान्त गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत भी आज के इस महनीय आयोजन में उपस्थित हुए। उन्होंने आचार्यश्री के चरणों में अपना नमन अर्पण करने के उपरान्त मंचासीन हुए। निर्धारित कार्यक्रमानुसार राष्ट्रगान का संगान हुआ। तेरापंथी सभा जालना के मंत्री श्री अनिल संचेती ने स्वागत वक्तव्य प्रस्तुत किया। श्री राजकुमार पुगलिया ने राज्यपाल महोदय का परिचय प्रस्तुत किया। मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी ने आज के कार्यक्रम की जानकारी व आचार्यश्री का परिचय प्रस्तुत किया।
15वें पट्टोत्सव के महनीय अवसर पर तेरापंथ आचार्य परंपरा के एकादश पट्टधर, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपने पावन उद्बोधन में कहा कि छह दिवसीय दीक्षा कल्याण महोत्सव वर्ष के संदर्भ में आयोजित समारोह का दूसरा दिन वैशाख शुक्ला दशमी का दिन है। यह तिथि परम श्रद्धेय, परम वंदनीय, प्रातः स्मरणीय भगवान महावीर से जुड़ी हुई है। भगवान महावीर ने तीस वर्ष की उम्र में संन्यास ग्रहण किया और लगभग साढे वर्षों तक कठोर व विशेष साधना की तप तपा। आज के दिन उनकी साधना फलीभूत हुई। आज के दिन उन्होंने केवलज्ञान को प्राप्त कर लिया था तथा वे सर्वज्ञ बन गए थे। आज का दिन ज्ञान प्राप्ति, वीतरागता प्राप्ति, शक्ति सम्पन्न व सर्वदर्शी होने का दिन है। भगवान महावीर तीर्थंकर बने। उनके द्वारा एक जैन शासन की परंपरा आगे बढ़ी।
साधना के लिए चार तीर्थ बताए गए हैं- साधु, साध्वी, श्रावक व श्राविका। कई साधु व साध्वी बन जाते हैं तो कितने लोग गृहस्थ जीवन रहते हुए श्रावक व श्राविका रूप में रहते हैं। जैन शासन में साधुत्व की साधना दो प्रकार से होती है-दिगम्बर व श्वेताम्बर। श्वेताम्बर परंपरा में भी मूर्तिपूजक व अमूर्तिपूजक दो परंपराएं प्राप्त होती हैं। अमूर्तिपूजक में भी स्थानकवासी व तेरापंथ की दो परंपरा है। हम तेरापंथ धर्मसंघ की परंपरा में साधना कर रहे हैं। इस संप्रदाय को प्रारम्भ हुए 264वां वर्ष चल रहा है। हमारे प्रथम आचार्य भिक्षु स्वामी हुए। वे हमारी परंपरा के जनक व आद्य अनुशास्ता हुए। अनुशासन राजनैतिक, सामाजिक व धार्मिक संगठन के लिए भी आवश्यक होता है।
हमारा धर्मसंघ धार्मिक संगठन है। हमारे यहां एक आचार्य और एक विधान की परंपरा है। इसमें वर्तमान आचार्य संघ के भावी आचार्य का निर्णय करते हैं। आज का दिन जो भगवान महावीर के कैवल्य प्राप्ति के दिन आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के निर्देश व निर्णय के अनुरूप तेरापंथ धर्मसंघ ने मुझे आज के दिन धर्मसंघ के नेतृत्व की चद्दर ओढ़ाई थी, दायित्व सौंपा था। इधर मुझे संन्यास लिए हुए भी पचास वर्ष पूर्ण होने वाला है। 160 के आसपास साधु, 550 से अधिक साध्वियां, समणियां, मुमुक्षु बाइयां व श्रावक-श्राविकाएं हमारे धर्मसंघ में हैं। संन्यासियों पर शासन करने का मौका मिलना भी बड़े सौभाग्य की बात है। हमारे विधान में आचार्य सर्वोच्च होते हैं। वे मानों एक सम्राट की भांति होते हैं। संगठन चलाने में स्वयं समर्पित रखना भी एक साधना होती है। संगठन के संचालन में आचार्य अपने सहयोगियों की नियुक्ति भी कर सकते हैं। साध्वियों की देखरेख का जिम्मा साध्वीप्रमुखाजी का है। साध्वी समुदाय में नम्बर दो पर साध्वीवर्या हैं। मुख्यमुनि हमारे साथ अनेक गतिविधियों में जुड़े हैं। इसके अलावा भी हमारे कितने संत विभिन्न संस्थाओं के संचालन में अपना दायित्व निभाते हैं। आज मुझे दायित्व मिले चौदह वर्ष पूर्ण हो गए हैं। आगे कालमान बढ़ रहा है। हम अध्यात्म की साधना को पुष्ट बनाने का प्रयास करते रहें।
गुजरात के राज्यपालजी का आना हुआ है। गुजरात की यात्रा के दौरान भी आपका दो बार आना हुआ था। राज्यपाल होने के साथ आप धार्मिक व दार्शनिक बातों को सुना तो मुझे लगा कि आप कोई धर्म के प्रचारक भी प्रतीत हुए। अध्यात्म के प्रचार-प्रसार का कार्य यथासंभव करते रहें। हमारे धर्मसंघ के साधु-साध्वियां, समणियां, श्रावक-श्राविकाएं, मुमुक्षु बाइयां व भाई खूब अच्छा विकास करते रहें, अपनी आत्मा का उत्थान करते रहें तथा दूसरों के कल्याण में जितना योगदान दे सकें, करने का प्रयास करना चाहिए। आज के दिन मैं परम पूज्य आचार्यश्री तुलसी और आचार्यश्री महाप्रज्ञजी दोनों गुरुओं के चरणों में अपना श्रद्धार्पण करता हूं।
युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के महामंगल उद्बोधन के उपरान्त गुजरात के राज्यपाल श्री आचार्य देवव्रत ने अपने अभिभाषण में कहा कि दीक्षा कल्याण महोत्सव में उपस्थित होकर मुझे बहुत सुखद अनुभव हो रहा है। आचार्यश्री ने बहुत छोटी आयु में जीवन के परम तत्व को समझते हुए इस भौतिक संसार से विरक्ति का मार्ग चुका और मानवता के कल्याण के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। आज उनको दीक्षा लिए पचास वर्ष पूर्ण हो गया है। मुझे बड़ा सुखद अनुभव हुआ कि इन छह दिनों में ही आपका जन्मदिवस, आचार्य पदारोहण दिवस व आपके संन्यास के पचास वर्ष भी पूर्ण हो रहे हैं। यह भव्य समारोह में आप सभी का चिंतन बहुत अच्छा होगा। आपका चिंतन आने वाली पीढियों व समाज के कल्याण का बहुत बड़ा कारण बनेगा।
भारत देश की संस्कृति पूरी दुनिया में सबसे पुरानी है। अमेरिका सहित सभी देशों का आगमन हजारों वर्षों में सिमट जाता है। आज विज्ञान के युग में वैज्ञानिकों बताया कि इस दुनिया को बने लगभग दो अरब वर्ष हुए हैं। वहीं भारत के ऋषियों, महर्षियों, मनीषियों व आचार्यों की कालगणना को पढ़ें तो हमारे पास एक अरब, छयान्वे करोड़, आठ लाख, तीरपन हजार एक सो चौबीस वर्ष हुए हैं। हमारा देश आर्यभट्ट जैसे महान वैज्ञानिक देने वाला है। सूर्य ग्रहण की सटिक गणना, सूर्य व चन्द्रमा की दूरी सब हमारे ज्योतिषि सटीक बता देते हैं। जो आज विज्ञान अपनी उपलब्धि मानता है, हमारे आचार्य, ऋषि इसके करके छोड़ चुके हैं।
हम महान ऋषियों की संतान हैं। हमारी परंपरा वैदिक, अध्यात्मवादी और विश्वकल्याण की सोच वाली है। हमें आचार्यजी जैसे संतों के निर्देशों व प्रेरणाओं पर चलने का प्रयास करना चाहिए। मैंने आचार्यश्री के पचास वर्ष की दीक्षा कल्याण का महोत्सव सबके जीवन को सरल व सुखी बनाने के अनेक कार्यक्रम समोयोजित हो रहे हैं। मानवता का दर्शन ने पूज्य आचार्यश्री महाश्रमणजी अपने साधु-साध्वियों व आप सभी अनुयायियों के द्वारा अभियान चला रहे है। यह महान कार्य आचार्यजी के नेतृत्व में हो रहा है। निःसंदेश मानवता का महान कार्य है। ऐसे लोग हो जाएं तो यह धरती ही स्वर्ग हो जाएगी। मुझे पूज्य आचार्यजी के दर्शन हुए, साधुओं की संगत मिली, इसके लिए मैं अपना सौभाग्य मानता हूं।
कार्यक्रम में अंत में व्यवस्था समिति जालना व स्थानीय सभा-संस्थाओं द्वारा राज्यपाल महोदय को सम्मानित किया गया। राज्यपाल महोदय का आचर्यश्री के साथ संक्षिप्त वार्तालाप का भी क्रम रहा। मुनि राजकुमारजी ने गीत का संगान किया। आचार्यश्री के साथ चतुर्विध धर्मसंघ ने संघगान किया। इसके साथ ही आचार्यश्री महाश्रमण दीक्षा कल्याण महोत्सव वर्ष के छहदिवसीय कार्यक्रम के दूसरे दिन का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।
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