पर्युषण पर्व भारतीय संस्कृति और जैन धर्म की एक विशेष परंपरा है, जो आत्मा की शुद्धि और आत्मा के गुणों की सजावट पर केंद्रित होता है। यह पर्व भौतिक सजावट की बजाय आत्मिक सजावट की ओर संकेत करता है और इसे विशेष रूप से श्वेतांबर और दिगंबर परंपराओं में अलग-अलग अवधि तक मनाया जाता है। श्वेतांबर परंपरा में यह पर्व आठ दिनों तक चलता है, जबकि दिगंबर परंपरा में इसका आयोजन दस दिनों तक किया जाता है। इस पर्व का मूल उद्देश्य आत्मा के गुणों को पहचानना और उन्हें विकसित करना है।
पर्युषण का अर्थ और महत्त्व
“पर्युषण” शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है—आत्म गुणों की पर्युपासना अर्थात आत्म तत्त्व के निकट रहना। यह पर्व आत्मा के आठ मौलिक शक्तियों को जागरूक करने और आंतरिक बुराइयों को समाप्त करने का अवसर प्रदान करता है। भारतीय संस्कृति में अष्टान्हिका महोत्सवों का प्रचलन रहा है, जो बाद में अध्यात्मिक तत्वों के साथ पर्युषण के रूप में बदल गया। इन आठ दिनों के दौरान, आत्मा की आठ मौलिक शक्तियों का आविर्भाव करने का प्रयास किया जाता है और आत्मा की आंतरिक जकड़न को कम किया जाता है।
आठ संकल्प: पर्युषण की विशेषता
पर्युषण पर्व के दौरान आठ संकल्प लिए जाते हैं, जो आत्मा की शुद्धि और दीन-हीनता के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक हैं। ये संकल्प निम्नलिखित हैं:
खामेमि सव्वे जीवा: इस संकल्प के तहत, व्यक्ति समस्त जीवों से क्षमा मांगता है और अपने मन से किसी के प्रति रोष, असंतोष या क्षोभ को समाप्त करने की प्रतिज्ञा करता है।
सव्वे जीवा खमंतु मे: यह संकल्प सभी जीवों से क्षमा याचना करने का है। व्यक्ति यह स्वीकार करता है कि किसी भी ज्ञात या अज्ञात स्थिति में उसने किसी को आहत किया हो, और सभी से क्षमा मांगता है।
मित्ती मे सव्व भूएसु: इस संकल्प में व्यक्ति सृष्टि के सभी जीवों के प्रति मैत्री और दोस्ती की स्थापना करता है, और किसी भी भिन्न भावना को त्यागता है।
वेरं मज्झं न केणइ: यह संकल्प शत्रुता और दुश्मनी को समाप्त करने का है। व्यक्ति अपने हृदय से सभी वैर-भाव को मिटाने की प्रतिज्ञा करता है।
तवो जोई जीवो जोईट्ठाणं: इसमें व्यक्ति अपनी आहार संबंधी आवश्यकताओं को छोड़कर आत्मा की विजय और आत्मानुभूति के आनंद की खोज करता है।
अनुग्रहार्थं स्वस्याति सर्गो दानम्: इस संकल्प के अंतर्गत व्यक्ति स्वाधिकारों की ममता को त्याग कर सर्वहित में दान देने की प्रतिज्ञा करता है।
तस्स भंते पडिक्कमामि: इस संकल्प के माध्यम से व्यक्ति अपने अतीत की त्रुटियों को स्वीकार करता है और उन परिमार्जन के लिए प्रतिक्रमण की विधि अपनाता है। यह संकल्प अतीत से मुक्ति और सुधार का प्रतीक है।
पच्क्खाणेणं आसव दाराइं निरुंभइ: इसमें व्यक्ति अपने भविष्य को पवित्र और निर्मल बनाने के लिए प्रत्याख्यान का आश्रय लेता है। यह संकल्प किसी भी अवांछनीय कार्य, आचरण या कथन से बचने का है।
उपसंहार
इन आठ संकल्पों के माध्यम से पर्युषण पर्व न केवल आत्मा की शुद्धि का अवसर प्रदान करता है बल्कि व्यक्ति को आत्मा के उच्चतम गुणों की ओर ले जाने की दिशा में मार्गदर्शित करता है। तीर्थंकर महावीर स्वामी ने इस पर्व को मनाने के लिए इन संकल्पों का आदेश दिया है, ताकि व्यक्ति आत्मा की गहराई को समझ सके और अपने जीवन को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से पुनः संवार सके।













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