श्रावस्ती नगरी में बकबलि नाम का युवक रहता था। वह महात्मा बुद्ध से बहुत प्रभावित था। वह रोज बुद्ध के दर्शन करने संघ जाता था। उसके इस नियम से उसके परिवार के सदस्य भी परेशान रहते थे, और अकसर उसे टोकते भी रहते थे। इससे परेशान होकर उसने सोचा कि घरवालों की रोज-रोज की रोक-टोक से वह बुद्ध के दर्शन भी ठीक से नहीं कर पाता है। इससे अच्छा है कि वह घर छोड़कर भिक्षुक बन जाए और संघ में ही रहने लगे। इससे वह बिना किसी रुकावट के रोज और जब चाहे भगवान बुद्ध के दर्शन कर सकेगा। यह विचार कर वह भिक्षुक बन गया और संघ में रहने लगा। अब वह रोज बुद्ध के दर्शन करने लगा। बुद्ध यह जानते थे कि बकबलि उनके दर्शन करते-करते उनकी नश्वर काया के प्रति आसक्त हो रहा है। वह उसे समझाना चाहते थे लेकिन वह यह जानते थे कि वह अभी साधना में कच्चा है। उसे उनकी बात समझ नहीं आएगी। कुछ समय पश्चात जब यह परिपक्व हो जाएगा तो वे उसे काया के प्रति उसके इस मोह के बारे में बताएंगे। अभी तो यह मेरे प्रति ही आसक्त है, कम-से-कम दूसरी आसक्तियों से तो बचा हुआ है।
इस तरह बकबलि को संघ में कई वर्ष बीत गए। वह अब पहले की तुलना में काफी परिपक्व हो चुका था। बाह्य आकर्षण से काफी हद तक मुक्त हो चुका था। लेकिन बुद्ध की काया दर्शन के प्रति उसकी आसक्ति अब भी बनी हुई थी। बुद्ध से उसका यह मोह छिपा नहीं था। उन्होंने एक दिन उसे अपने पास बुलाकर कहा, ‘देख बकबलि मेरे प्रति तेरी आसक्ति को मैं जानता हूं। लेकिन ध्यान रख यह मोह ही तुझे एक दिन रुलाएगा। जिस दिन मेरी यह नश्वर देह नहीं रहेगी, तब तू किसके दर्शन करेगा।’ यह सुनकर वह बोला, ‘भगवन, आप ऐसा क्यों कह रहे हैं? आपसे पहले तो मेरे प्राण जाएंगे।’ उसकी बात सुनकर बुद्ध समझ गए कि यह मुझे बाहर से देखता है, मेरे भीतर को नहीं, इसलिए इसके ऊपर मेरे उपदेशों का कोई असर नहीं हो रहा है। जब तक यह मेरे भीतरी रूप को नहीं देखेगा, तब तक इसका मोह नहीं छूटेगा।
कुछ समय पश्चात बुद्ध को कहीं से निमंत्रण आया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। बुद्ध ने संघ में सभी शिष्यों को बुलाकर कहा कि वह कुछ समय के लिए बाहर जा रहे हैं। यह सुनकर बकबलि रोने लगा कि वह उनके बिना कैसे रहेगा। यह देखकर बुद्ध ने उसे अपने पास बुलाया और कहा कि अभी तो वह कुछ समय के लिए जा रहे हैं, तब उसका यह हाल है। जब वह हमेशा के लिए इस नश्वर देह को छोड़कर जाएंगे, तब उसका क्या हाल होगा। उसका यही मोह उसके रोने का कारण बनेगा। यह सुनकर बकबलि को होश आया कि भगवान बुद्ध सही कह रहे हैं। मुझे उन्हें बाहर से नहीं, भीतर से देखना होगा। उनके उपदेशों में वह हमेशा मेरे साथ रहेंगे।













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