खेड़े, धुळे (महाराष्ट्र) : जन-जन के मानस को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने के लिए निरंतर गतिमान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी वर्तमान में महाराष्ट्र के धुळे जिले को पावन बना रहे हैं। गुरुवार को प्रातःकाल की मंगल बेला में धुळे के जिला मुख्यालय से अगले गंतव्य की ओर प्रस्थित हुए तो धुळेवासियों ने अपने आराध्य के श्रीचरणों में अपने कृतज्ञभाव समर्पित किए। जन-जन को आशीष प्रदान करते हुए आचार्यश्री आगे बढ़ चले। आसमान में छाए बादलों ने सूर्यकिरणों से राहत प्रदान करने का प्रयास तो अवश्य किया, किन्तु भारत में मानसून के सक्रिय हो जाने के कारण यदा-कदा हो रही बरसात से उमस की स्थिति बन गयी है, जो लोगों को पसीने से नहला रही है। प्राकृतिक अनुकूलता-प्रतिकूलता से सवर्था विरत दिखने वाले महातपस्वी निरंतर गतिमान थे। मार्ग में अनेक स्थानों पर ग्रामीण जनता को आशीष प्रदान करते हुए लगभग 12 किलोमीटर का विहार कर खेड़े गांव में स्थित गांधी एण्ड फुले (तांत्रिक) विद्यालय में पधारे।
विद्यालय परिसर में आयोजित मंगल प्रवचन कार्यक्रम में समुपस्थित जनता को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने कहा कि प्रश्न किया गया कि प्राणी किससे डरते हैं? इसका उत्तर प्रदान किया गया कि आदमी दुःखों से भय खाता है। पुनः प्रश्न हुआ कि दुःख पैदा कैसे होता है? इसका भी प्रत्युत्तर प्रदान करते हुए बताया गया कि प्राणी स्वयं ही अपने प्रमाद, आसक्ति, मोह, कषाय आदि के कारण दुःख को पैदा कर लेता है। प्रमाद से दुःखों की वृद्धि होती है। विषयों के प्रति आसक्ति, मोह से भी दुःख की प्राप्ति होती है और प्राणी दुःखों से डरता है। आपकी के भीतर व्याप्त कामानुवृद्धि, इच्छा, तृष्णा, मोह आदि कम हो जाए अथवा क्षीण हो जाए तो आदमी सर्व दुःख मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
सर्व दुःख मुक्ति दिशा में आगे बढ़ते-बढ़ते आदमी कभी शाश्वत सुख अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति भी कर सकता है। त्यागी साधु-संतों के प्रवचन श्रवण अथवा सत्संगति से मोह, आसक्ति को कम करने की प्रेरणा भी प्राप्त हो सकती है। प्रवचन श्रवण से धर्म की जानकारी होती है। धर्म की जानकारी हो जाती है तो लोभ, मोह, तृष्णा से मुक्ति का मार्ग भी प्रशस्त हो सकता है। इस दिशा में कभी आगे बढ़ते-बढ़ते अनासक्ति की भावनाओं का विकास हो सकता है और आदमी के जीवन की दशा व दिशा भी बदल सकती है। धर्मगुरुओं की वाणी, साधु-संतों की वाणी कल्याणकारी हो सकती है।
आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त विद्यालय की मुख्य अध्यापिका श्रीमती रजनी महाजन व खेड़े श्रीसंघ की ओर श्री प्रदीप चतुरमूथा ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। तथा आचार्यश्री से पावन आशीर्वाद प्राप्त किया।













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