लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, महातपस्वी, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी वर्तमान समय में तेरापंथ की राजधानी लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती के विशाल एवं सुरम्य परिसर में योगक्षेम वर्षकाल पूर्ण कर रहे हैं। आचार्यश्री की इस स्थायित्व का पूर्ण लाभ चतुर्विध धर्मसंघ को प्राप्त हो रहा है।
नित्य की भांति सुधर्मा सभा में प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन कार्यक्रम का शुभारम्भ युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ हुआ। साध्वीवृंद ने प्रज्ञा गीत का संगान किया। तदुपरान्त शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘धर्म का निवास कहां’ विषय को व्याख्यायित करते हुए कहा कि प्रश्न हो सकता है कि धर्म का निवास कहां होता है और धर्म से क्या प्राप्त हो सकता है? आध्यात्मिक जगत में मोक्ष की बात आती है। धर्म की साधना का अंतिम लक्ष्य मोक्ष ही होता है। मोक्ष मिलने के बाद धर्म वही कृत-कृत्य हो जाता है। सिद्धों में कोई चारित्र, संवर और निर्जरा नहीं होते, ये सभी संसारी जीवों के लिए मोक्ष प्राप्ति के साधन हैं। सिद्धि प्राप्ति के बाद साधन महत्त्व नहीं होता। साधन का महत्त्व तभी तक होता है, जब तक की सिद्धि की प्राप्ति नहीं हो जाती। अब प्रश्न हो सकता है कि मोक्ष को कौन जीव प्राप्त कर सकता है? उत्तर प्रदान किया गया कि मोक्ष को वही जीव प्राप्त कर सकता है, जिसके जीवन में धर्म होता है। जो धर्म की साधना करता है, वही मोक्ष प्राप्त कर सकता है। प्रश्न हो सकता है कि धर्म किसके शरीर में ठहरता है? उत्तर दिया गया कि धर्म शुद्ध आदमी में ठहरता है। तीसरा प्रश्न होता है कि शुद्ध कौन होता है? आगमवाणी में कहा गया है कि जो ऋजु अर्थात् सरल होता है, उसकी शोधि होती है। इस प्रकार ऋजुता कितनी महत्त्वपूर्ण होती है। यदि जीवन में धर्म को ठहराना है तो उसकी पात्रता है, जीव का ऋजु हो जाना।
जहां सरलता होती है, वहां धर्म ठहरता है। एक साधु को सरल माना जा सकता है। यदि उसके जीवन में सरलता नहीं है तो वह न जाने कितने-कितने दोष स्वयं को लगा रहा है। यदि उसमें सरलता नहीं है, छल-कपट कर लेता है, कई प्रकार के दोषों को अपने जीवन के साथ बांध लेता है। इसलिए कहा जा सकता है कि जो सरल होता है, उसकी शोधि हो जाती है। जो सरल होता है, वह साधु अपनी दोषों को स्वीकार कर लेता है और प्रायश्चित्त स्वीकार कर लिया तो उसकी शोधि हो गई। इस प्रकार वह शुद्ध होता है।
जिस प्रकार बालक अपने माता-पिता के सामने जितनी सरलता के साथ अपनी बातें रख देता है, उसी प्रकार साधु को अपने प्रायश्चित्तप्रदाता के सामने अपने दोषों को नम्रता से स्वीकार कर लेता है और प्रायश्चित्तदाता भी यथायोग्य प्रायश्चित्त प्रदान कर दें और वह उसका पालन कर ले तो उसकी शोधि हो सकती है। इसलिए आदमी को सरल बनने का प्रयास करना चाहिए। छल-कपट के द्वारा दोषों को इकट्टठा करने से बचने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में सरलता होती है तो शुद्धता होती है। जिसका जीवन शुद्ध होता है और जो शुद्ध होता है, उसके जीवन में धर्म का निवास होता है तथा जिसके जीवन में धर्म होता है, तो उसे कभी मोक्ष की प्राप्ति भी हो सकती है।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने बहुश्रुत परिषद के चारित्रात्माओं के उपरान्त आचार्यश्री ने मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान योगक्षेम वर्ष के दौरान प्रतिदिन कुछ समय ध्यान के प्रयोग के लिए निर्धारित किया। तदुपरान्त आचार्यश्री के निर्देशानुसार जिज्ञासा-समाधान का भी क्रम चला। चारित्रात्माओं द्वारा किए जाने वाली जिज्ञासाओं को आचार्यश्री ने समाहित किया।













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